★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आपको याद होगा, पिछले ही साल उत्तरप्रदेश के कई कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों में एक ऐसी महिला के नाम पर उन विद्यालयों में अध्यापिका बनी कई महिलाओं ने धोखा-धड़ी करके लाखों रुपये के वेतन लिये थे, जिसने व्यक्तिगत कारण से चयन होने के बाद भी नौकरी नहीं की थी, फिर क्या था, उसी महिला के नाम और उसके शैक्षिक प्रपत्रों के आधार पर कुपात्र महिलाओं ने उत्तरप्रदेश के कई ज़िलों में शिक्षा माफ़ियाओं के साथ साँठ-गाँठ करके कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों में अध्यापिका की नौकरी करने लगी थीं। इस प्रकरण में बड़ी संख्या में जालसाज़ी करनेवाली महिलाओं की गिरिफ़्तारी हुई थी। गिरिफ़्तारी के बाद उन पर कौन-कौन-से मुक़द्दमे चलाये गये या फिर ले-देकर छोड़ दी गयीं, आज तक मालूम नहीं हुआ है।
बदनामी की चादर ओढ़े उन्हीं विद्यालयों से बाहर घोटाले के कई जिन्न एक साथ बाहर आ चुके हैं। आश्चर्य है कि जब कोरोनाकाल में सभी विद्यालय बन्द किये जा चुके हैं, वैसी स्थिति में उत्तरप्रदेश के १८ ज़िलों के कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय काग़ज़ पर खोले गये हैं, जिनमें छात्राओं की उपस्थिति तक दिखायी गयी है और छात्राओं को दी जानेवाली निश्शुल्क शासकीय सुविधाओं के नाम पर उन विद्यालयों से वर्ष २०२०-२१ सत्र के लिए सम्बन्धित अधिकारियों ने मिलकर लगभग ९ करोड़ रुपये डकार लिये हैं। जिन ज़िलों के विद्यालयों से लाखों की संख्या में रुपये निकाले गये हैं, उनमें गोंडा में ९६ लाख, बरेली में ८४ लाख, प्रतापगढ़ में ७६ लाख, बिजनौर में ७४ लाख, देवरिया में ६८ लाख, रायबरेली में ६३ लाख, उन्नाव में ४७ लाख, सुलतानपुर में ५३ लाख, मुरादाबाद में ३९ लाख, सन्त कबीरनगर में ३८ लाख, वाराणसी में ३७ लाख, कांशीराम नगर में ३१ लाख, फ़तेहपुर में ३१ लाख, सोनभद्र में २६ लाख, मेरठ में २६ लाख, श्रावस्ती में २६ लाख, मऊ में २३ लाख तथा ग़ाज़ियाबाद में १८ लाख रुपये के घोटाले साफ़-साफ़ दिख रहे हैं।
ज्ञातव्य है कि उत्तरप्रदेश के कुल ७५ ज़िलों में से लगभग सभी ज़िलों में इस आवासीय विद्यालय की व्यवस्था है। इन विद्यालयों में छठी कक्षा से आठवीं कक्षा तक की छात्राओं के लिए भोजन और अध्ययन की निश्शुल्क सुविधाएँ हैं। उन छात्राओं के रहने के लिए निश्शुल्क आवासीय व्यवस्था भी है। इतना ही नहीं, उन्हें दवा, स्टेशनरी, साबुन, तेल, मंजन, ब्रश तथा अन्य आवश्यक वस्तुएँ भी निश्शुल्क उपलब्ध करायी जाती हैं। इसके लिए छात्राओं की संख्या के आधार पर शासन-स्तर पर एक परिव्यय (बजट) तैयार किया जाता है। विद्यालय के सम्बन्धित अधिकारी आन्तर्जालिक (ऑन-लाइन) ‘प्रेरणा पोर्टल’ पर छात्राओं की संख्या दिखलाकर प्रति माह अपने परिव्यय के अनुसार रुपये निकाल लेते हैं। इसमें प्रवेश पाने के लिए ७५℅ स्थान अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यक वर्ग की लड़कियों के लिए आरक्षित हैं और शेष २५℅ निर्धनता-रेखा के नीचे जीवन-यापन करनेवाली लड़कियों के लिए।
जहाँ ‘ज़ीरो करप्शन पॉलिसी’ की बात करनेवाले उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ की कथनी-करनी के अन्तर प्याज के छिलके की तरह से उतरते आ रहे हैं, वहीं बेसिक शिक्षामन्त्री सतीश द्विवेदी के चरित्र, चाल, चेहरे भी भ्रष्टाचार के कटघरे में आ चुके हैं; क्योंकि नहीं भूलना चाहिए, वे वही बेसिक शिक्षामन्त्री हैं, जिनके भाई अनिल द्विवेदी को अवैध तरीक़े से एक विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति मिल चुकी थी। उसका जब उग्र विरोध हुआ और भारतीय जनता पार्टी की गर्हित नीति की कलई खुलने लगी; चारों ओर से भर्त्सना होने लगी तब उनके भाई से त्यागपत्र दिलवाया गया था।
यह बात किसी से नहीं छिपी है कि उत्तरप्रदेश के ९० प्रतिशत बेसिक शिक्षा अधिकारी महाभ्रष्ट है; निरंकुश हैं; कर्त्तव्यविहीन हैं। ऐसा इसलिए कि शिक्षामन्त्रालय-स्तर पर वे ‘पाप की कमाई’ का एक निर्धारित हिस्सा भेजते आ रहे हैं, जिसे सरकारी भाषा में ‘टार्गेट पूरा करना’ कहते हैं।
शिक्षाधिकारियों ने उक्त आवासीय विद्यालयों में रहनेवाली छात्राओं को दिये जानेवाले भोजन, दूध, दवा, गद्दा, रजाई, कम्बल, तकिया, बैग़, जूता, ट्रैक शूट आदिक के नाम पर करोड़ों डकार लिये हैं। हम केवल सुलतानपुर की बात करें तो वहाँ कुल १२ कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय हैं, जिनमें से १० विद्यालयों की पंजिका में १००-१०० और दो विद्यालयों में ५०-५० छात्राओं के नाम अंकित हैं। वहाँ के लेखाधिकारी आर० एस० यादव से जब पूछा गया तब उन्होंने १,१०० छात्राओं के लिए खाद्यान्न पर २२ लाख, स्टेशनरी पर १२ लाख, युनीफॉर्म, दवा, जूता, ट्रैक शूट, ब्रश, मंजन आदिक के नाम पर ११ लाख, बिस्तर आदिक पर ८ लाख रुपये के भुगतान किये जा चुके हैं। ग़ौर करने लायक़ है कि खाद्यान्न-आपूर्ति के लिए कुल रुपये के भुगतान करने के बाद भी एक छटाँक अन्न विद्यालयों में नहीं पहुँचे हैं, जो कि जाँच का विषय है।
उक्त घोटाले के खुलासे के स्रोत सुलतानपुर के १२ विद्यालय रहे हैं। उनमें पढ़नेवाली सभी छात्राओं को कोरोना-संक्रमण के भय से उनके घर भेज दिया गया था। घोटाले की आग की लपटें जब सम्बन्धित अधिकारियों के बिस्तरे के पास पहुँची हैं तब उनकी तपन से कुम्भकर्णी नींद में सो रहे अधिकारियों की आँखें खुली हैं। अब, जब अन्य ज़िलों के विद्यालयों से जानकारी माँगी गयी तब चौंकानेवाले विवरण सामने आये हैं।
आश्चर्य तब होता है जब विद्यालय बन्द थे; छात्राएँ घर जा चुकी थीं। ऐसे में, सम्बन्धित अधिकारी उनके भोजन, दवा, अध्ययन, आवास तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं के मद में प्रतिमाह रुपये क्यों निकालते रहे?
ये सभी रुपये ११ फ़रवरी, २०२१ से ३१ मार्च, २०२१ ई० तक में निकाले गये थे।
इस घोटाले-काण्ड को लेकर देश के विपक्षी नेताओं ने उत्तरप्रदेश के बेसिक शिक्षामन्त्री सतीश द्विवेदी को आड़े हाथों लिया है। उन पर आरोप है कि उन्होंने छात्राओं को दिये जानेवाले मिड-डे-मिल, युनीफॉर्म, जूता, स्टेशनरी आदिक में घोटाला करवाकर अपने भाई अनिल कुमार पुत्र अयोध्या प्रसाद निवासी शनिचरा के नाम पर १२ लाख रुपये के सर्किल रेट से एक ज़मीन ख़रीदी है, जबकि उस ज़मीन का वास्तविक सर्किल रेट २० लाख रुपये है।
राज्य-परियोजना निदेशक विजय किरण आनन्द ने अपने स्तर पर जब जाँच करायी थी तब ग़रीब छात्राओं को दिये जानेवाले भोजन, दवा, स्टेशनरी, गणवेश (युनीफॉर्म), जूते, साबुन, मंज़न, ब्रश, तेल आदिक ख़रीदने में घोटाले का पर्दाफ़ाश हुआ है। उन्होंने पाया है कि ‘प्रेरणा पोर्टल’ पर उपलब्ध छात्रा-संख्या बहुत ही कम है, जबकि उनकी बहुत अधिक संख्या दिखाकर रुपये निकाले गये हैं। ये घोटाले १८ ज़िलों के विद्यालयों के अधिकारियों ने ११ फ़रवरी, २०२१ ई० से ३१ मार्च के बीच किये हैं। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि छात्राओं की उपस्थिति ‘प्रेरणा पोर्टल’ पर अंकित नहीं हुई है। इसके बावुजुद छात्राओं पर किये जानेवाले विभिन्न व्यय की १०० % धनराशि का भुगतान दिखाया गया है, जो कि वित्तीय अनियमितता की सीमा में आता है। ज्ञातव्य है कि इस नियम और अनुशासन से सभी को अवगत करा दिया गया है कि ‘प्रेरणा पोर्टल’ पर छात्राओं की प्रतिदिन की उपस्थिति के अनुसार ही भुगतान किया जायेगा। वैसा न होने पर अधीक्षिक, ज़िला समन्वयक (बालिका-शिक्षा), सहायक वित्त और लेखाधिकारी व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होंगे। विजय किरण आनन्द ने उक्त घोटाले के विषय में अपनी जो रिपोर्ट तैयार की है, उसमें उन्होंने बेसिक शिक्षा अधिकारी, अधीक्षक ज़िला समन्वयक (बालिका-शिक्षा), प्रभारी, सहायक वित्त तथा लेखाधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराते हुए १५ जून, २०२१ ई० तक सम्बन्धित समस्त प्रपत्र उपलब्ध कराने का निर्देश किया है।
इस जाँच की परिधि में सम्बन्धित ज़िलों के समस्त ज़िलाधिकारियों को भी लाना होगा। ऐसा इसलिए कि उन ज़िलाधिकारियों ने वर्षभर में कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों के प्रबन्धन, विशेषत: छात्रावास-व्यवस्था का अकस्मात दौरा करते हुए कितनी बार निरीक्षण किये थे। इसका उन सभी ज़िलाधिकारियों से सप्रमाण उत्तर माँगना होगा; क्योंकि उक्त घोटालों से वे अपने उत्तरदायित्व का पल्ला नहीं झाड़ सकते।
संलिप्त अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से निलम्बित करते हुए, आर्थिक अनियमितता के लिए निर्धारित कठोरतम प्रविधानों के अन्तर्गत मुक़द्दमा चलाया जाना चाहिए और दोषी सिद्ध होने पर उन सभी को नौकरी से बाहर का रास्ता दिखाते हुए, ब्याजसहित कुल धनराशि की वसूली करनी होगी, अन्यथा भ्रष्टाचार के बरगद-वृक्ष फूलते-फलते रहेंगे।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ जून, २०२१ ईसवी।)