★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
पिछले सात-आठ वर्षों से जिस तरह से बैंक-घोटाले कराये जा रहे हैं और ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ उन घोटालों पर चुप्पी साधे हुए है, उससे एक बात सुस्पष्ट हो चुकी है कि कुछ अदृश्य शक्ति की बुरी निगाहें देश की जनता की ख़ून और पसीने की गाढ़ी कमाई पर स्थिर हो चुकी हैं। कथित मोदी-सरकार ने बहुत पहले ही घोषणा कर ही दी थी कि यदि किसी की बैंक मे जमा की गयी धनराशि डूबती भी है तो उसे ५ लाख रुपये देकर बैंक पल्ला झाड़ सकता है, भले ही जनता के २५-५० लाख या करोड़ों रुपये जमा हों। अब देश की जनता को किसी भी बैंक के प्रति विश्वास करके उसमे निवेश नहीं करना होगा; क्योंकि किस बैंक को कौन-सा उद्योगपति राजनैतिक प्रश्रय पाकर कंगाल कर जाये, इसे समझ पाना बहुत आसान नहीं है। मोदी-सरकार के अब तक के कार्यकाल मे ५३,५०,००० करोड़ रुपये के बैंक-घोटाले किये जा चुके हैं। देश की जनता के ८,१७,००० करोड़ रुपये बट्टे-खाते मे डुबो दिये गये हैं तथा २१,००,००० करोड़ रुपये की वृद्धि बैंकों के एन० पी० ए० (नॉन परफार्मिंग एसेट) मे की जा चुकी है। यहाँ यह बात ग़ौर करने-लायक़ है कि जो सरकार “डंके की चोट पर” ख़ुद को पाक-साफ़ कहती आ रही है और पिछले सात-आठ सालों से जिस प्रकार की ‘चौकीदारी’ करती आ रही है, अब उसकी पोल अच्छी तरह से खुलती नज़र आ रही है। हीरा-व्यापारी नीरव मोदी और मेहुल चौकसी ने पंजाब नेशनल बैंक मे १४,००० करोड़ रुपये की धाँधली की थी और ‘किंग फ़ीशर’ का सरगना शराब-व्यापारी विजय माल्या ९,००० करोड़ रुपये बैंकों को चूना लगाकर फुर्र हो गया। उन सभी पर मुक़द्दमे दर्ज़ हैं; पर अभी तक कहीं कोई प्रगति नहीं दिख रही है।
इस बीच, बैंक से सम्बन्धित कई अन्य घोटाले हुए हैं। अभी इन सभी घोटालों की अनुगूँज कुछ ठण्ढी पड़ी ही थी कि ‘जिन्ना के जिन्न’ की तरह से एक और घोटाला आ टपका है, जो कि महाघोटाला है और पाँच राज्यों के चुनाव की आड़ मे फ़िलहाल दबा हुआ-सा दिख रहा है; लेकिन उसे दबाया नहीं जा सकता।
उल्लेखनीय है कि पानी के जहाज़-निर्माण और सुधार करनेवाली कम्पनी ‘ए० बी० जी० शिपयार्ड’, ए० बी० जी० इण्टरनेशनल प्रा० लि० और उसके निदेशकों ने मिली-भगत करके देश को एक ऐतिहासिक चूना लगा दिया है। ए० बी० जी० शिपयार्ड गुजरात के ‘दहेज’ और ‘सूरत’ मे स्थित हैं, जबकि ए० बी० जी० प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी महाराष्ट्र मे। ये दोनो व्यावसायिक प्रतिष्ठान एक ही समूह के हैं। ‘भारतीय स्टेट बैंक’ के अधिकारियों की माने तो ए० बी० जी० कम्पनी के निदेशकों ने भारतीय स्टेट बैंक से २,९२५ करोड़ रुपये, आइ० सी० आइ० सी० आइ० बैंक से ७,०८९ करोड़, आइ० डी० बी० आइ० से ३,६३४ करोड़, बैंक ऑफ़ बड़ौदा से १,६१४ करोड़, एग्ज़िम बैंक से १,३२७ करोड़, इण्डियन ओवरसीज बैंक से १,२२८ करोड़ रुपये, स्टैण्डर्ड चार्टर् र्ड बैंक से ७४३ करोड़, बैंक ऑफ़ इण्डिया से ७१९ करोड़-सहित २८ बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थानो से कुल २२,८४२ करोड़ रुपये ऋण के रूप मे लिये थे; लेकिन उस धनराशि का भुगतान नहीं किये थे। कम्पनी के निदेशकों ने जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ऋण लिये थे, उसके विपरीत आर्थिक अपराध की ओर प्रवृत्त हो गये थे। इस आर्थिक अनियमितता के विरुद्ध ‘केन्द्रीय जाँच ब्यूरो’ (सी० बी० आइ०) ने ‘रुपये का दुरुपयोग’, ‘आपराधिक षड्यन्त्र’, ‘धोखाधड़ी’, ‘आपराधिक विश्वासघात’, ‘वित्तीय अनियमितता’, ‘आधिकारिक दुरुपयोग’ तथा ‘बैंक की क़ीमत पर अवैध गतिविधियाँ’ जैसे आरोप लगाकर एफ० आइ० आर० भी दर्ज़ करा दिया था। यह बैंक-घोटाला अप्रैल, वर्ष २०१२ से जुलाई २०१७ तक की अवधि का है। अब ए० बी० जी० शिपयार्ड लिमिटेड, उसके तत्कालीन अध्यक्ष एवं प्रबन्ध निदेशक ऋषि कमलेश अग्रवाल, कार्यकारी निदेशक संथानम् मुत्थूस्वामी, अश्विनी कुमार, सुशील कुमार अग्रवाल, रवि विमल नेवेतिया, मेसर्स ए० बी० जी० इण्टरनेशनल प्रा० लि०, अज्ञात लोकसेवक और निजी जन भारतीय दण्ड संहिता के ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के १२०-बी, ४०९, ४२० तथा १३(१) डी, और १३ (२) के अन्तर्गत आरोपित बनाया गया है, जिनमे उन पर २८ बैंकों के साथ २२,८४२ करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का आरोप मढ़ा गया है, जिसे सी० बी० आइ० की ओर से देश मे अब तक का सबसे बड़ा बैंक-घोटाला बताया गया है।
इस घोर आर्थिक आपराधिक कृत्य को ऐसे समझें–
● जुलाई, २०१६ ई० मे ए० बी० जी० शिपयार्ड लि० ने पहली बार ऋण-खाते पर ‘नॉन परफॉर्मिंग एसेट’ (एन० पी० ए०) घोषित किया था।
● १८ जनवरी, २०१९ ई० को ‘अर्न्स्ट ऐण्ड यंग एल पी’-द्वारा अप्रैल, २०१२ से जुलाई, २०१७ ई० तक ‘फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट की जाँच मे ए० बी० जी० प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी-द्वारा बड़े पैमाने पर की गयी आर्थिक अनियमितता की बात सामने आयी थी।
● बैंकों के संघ की ओर से ‘भारतीय स्टेट बैंक, मुम्बई शाखा के उप-महाप्रबन्धक बालाजी सिंह सामन्त ने ८ नवम्बर, २०१९ ई० को आर्थिक अनियमितता की शिकायत दर्ज़ करायी थी।
● वर्ष २०१९ मे ए० बी० जी० शिपयार्ड लि० के ऋण और बैंक-खातों को ‘धोखा-धड़ी से युक्त’ (फ्रॉड) घोषित किया गया था।
● सी० बी० आइ० ने १२ मार्च, २०२० ई० को भारतीय स्टेट बैंक के अधिकारियों से कुछ विषयों पर स्पष्टीकरण मागे थे।
● बैंकों के संघ की ओर से २५ अगस्त, २०२० ई० मे पुन: लिखित शिकायत दर्ज़ करायी गयी थी।
● सी० बी० आइ० ने अपने स्तर पर उस प्रकरण की जाँच लगभग दो वर्षों के बाद करायी थी।
● जाँच के बाद आरोप को सत्य मानकर सी० बी० आइ० ने ७ फ़रवरी, २०२२ ई० को प्राथमिकी दर्ज़ करानेवाली शिकायत पर काररवाई की थी।
यह बैंक-घोटाला तब सामने आया जब १२ फ़रवरी, २०२२ ई० को भारतीय स्टेट बैंक ने इसे सार्वजनिक किया था। उसके बाद सी० बी० आइ० १२ फ़रवरी को ही सक्रिय हुई और सूरत, भरूच, मुम्बई, पुणे-सहित कई राज्यों के १३ स्थानो पर कई निदेशकों के आवासों-निवासों मे छापामारी की थी, जिसमे उसने कई सम्बन्धित दस्तावेज़ बरामद किये हैं, साथ ही ८ आरोपितों को गिरिफ़्तार भी किये हैं। इसकी जानकारी सी० बी० आइ० की ओर से १३ फ़रवरी को दी गयी थी।
सूरत-स्थित उस कम्पनी-द्वारा निर्मित जहाज़ विदेश मे भी बेचे जाते रहे हैं। उस कम्पनी पर ऋण लेकर उसका दुरुपयोग करने का ही आरोप नहीं है, बल्कि यह भी कि उसने कई प्रकार की क्रेडिट-सुविधाएँ भी ले रखी हैं। इतना ही नहीं, उसने २३६ करोड़ रुपये सिंगापुर भी भेजे हैं।
यहाँ सी० बी० आइ० की भूमिका सन्दिग्ध दिखती है। ऐसा इसलिए कि बैंकों की ओर से कम्पनी के ऋण और बैंक-खातों को ‘फ्राड एकाउण्ट’ घोषित करने के लगभग दो वर्षों के बाद सी० बी० आइ० ‘कुम्भकर्णी नीद’ से जगी है और अब उसने काररवाई शुरू की है। प्रश्न है– कम्पनी को ‘फ्रॉड’ घोषित करने के तुरन्त बाद उसके विरुद्ध एफ० आइ० आर० क्यों नहीं लिखवायी गयी थी? सी० बी० आइ० दो वर्षों तक क्या करती रही, ये प्रश्न उससे किये जाने चाहिए। सच तो यह है कि भारतीय स्टेट बैंक, सी० बी० आइ० तथा नरेन्द्र मोदी ने इस पूरे आपराधिक प्रकरण को एक अबूझ चाल मे फँसाकर उलझा दिया है।
यहाँ ग़ौर करने-लायक़ बात यह है कि कोई भी बैंक किसी कम्पनी के खाते को ‘फ्रॉड’ तभी घोषित कर सकता है, जब ऋण देनेवाले बैंकों की संयुक्त बैठक मे ‘फॉरेंसिक रिपोर्ट’ पर विचार-विमर्श किया जाता है। खाते को ‘फ्रॉड’ घोषित करने के पश्चात् आरम्भिक शिकायत सी० बी० आइ० के पास की जाती है, फिर प्रकरण से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण जानकारी एकत्र की जाती है। इतना हो जाने के बाद जाँच के लिए दूसरी बार शिकायत की जाती है, जो सी० बी० आइ० के लिए जाँच का आधार बनती है।
इस कम्पनी को जाने–
● इस कम्पनी का नाम ‘ए० बी० जी० शिपयार्ड लिमिटेड’ है, जो सूरत मे स्थित है।
● इसकी स्थापना वर्ष १९८५ में की गयी थी। इसका मुख्यालय मुम्बई (महाराष्ट्र) मे है।
● यह निजी जहाज़-निर्माण करनेवाली देश की सबसे बड़ी कम्पनियों मे से एक है।
● ए० बी० जी० शिपयार्ड लि० विविध व्यावसायिक हितोंवाली कम्पनियों के ए० बी० जी०-समूह का एक भाग है।
● इस कम्पनी के शिपयार्ड गुजरात के दहेज और सूरत मे स्थित हैं।
● यह कम्पनी अनेक प्रकार के फ़्लोटिंग क्रेन, इण्टरसेप्टर बोट, न्यूज़ प्रिण्ट कैरीयर्स-जैसे जहाज़ों का निर्माण करती है।
मोदी-सरकार के कार्यकाल मे हुए बैंक-घोटाले :–
● पंजाब नेशनल बैंक घोटाला
● विजय माल्या बैंक घोटाला
● वीडियोकॉन घोटाला
● पी० एम० सी० बैंक घोटाला
यह ग़ौर करने-लायक़ है कि उपर्युक्त कम्पनी कोई सामान्य स्तर की कम्पनी नहीं है। उसने १६ वर्षों मे लगभग १७० जहाज़ों के निर्माण किये हैं, जिनमे निर्यात करने के लिए ४६ जहाज़ भी शामिल हैं। उसके साथ ‘भारतीय नौसेना’ के लिए भी जहाज़-निर्माण करने का अनुबन्ध हुआ था, जिसे कम्पनी की खस्ता हालत देखते हुए रद्द कर दिया गया था।
यदि निष्पक्ष जाँच करायी गयी तो इस महाघोटाले मे शामिल बैंक के कई शीर्षस्थ अधिकारी और राजनेताओं पर गाज़ गिर सकती है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

लेखक भाषाविज्ञानी और समीक्षक हैं।
मो० नं०– 9919023870
prithwinathpandey@gmail.com
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १४ फ़रवरी, २०२२ ईसवी।)