आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

”देखिए! ये हसीं शाम ढलने को है,
अब तो जाने की इजाज़त दे दो मुझे।”

यह युगल गीत ‘राज़’ फ़िल्म का है, जिसे लता मंगेश्कर जी और मुकेश जी ने गाये हैं।

यहाँ पर दो विचारणीय तथ्य हैं :— पहला, ‘देखिए’ का प्रयोग और दूसरा ‘दे दो’ का। पहला है, ‘आदरसूचक सम्बोधन’ और दूसरा है, ‘समस्तरीय क्रियात्मक प्रयोग’। ये दोनों ही प्रयोग एक ही व्यक्ति के लिए एक ही समय में किये गये हैं। ज्ञातव्य है कि यह शब्द-प्रयोग व्याकरण-सम्मत नहीं है। इसी प्रकार से किस शब्द के साथ स्त्रीलिंग और किस शब्द के साथ पुंल्लिंग का प्रयोग होगा, फ़िल्मी दुनिया इससे बाख़बर नहीं है।

यह प्रयोग पूर्णतः इस प्रकार का है :– आइए! बैठो न। आप अभी आये हो।

इस प्रकार के फ़िल्मी प्रयोग बहुतायत में किये गये हैं और किये जा रहे हैं। इस विसंगतिपूर्ण विषय पर एक संगतिपूर्ण शोध-कर्म किया जा सकता है। निस्सन्देह, कई दशकों से शोध-कर्म के नाम पर ‘चौर-कर्म’ किया जा रहा है, जिसके लिए कथित शोध करनेवाले-करानेवाले तथा शोध-कर्म का परीक्षण करनेवाले पूर्णतः उत्तरदायी हैं; दूसरी ओर, ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ में बड़ी संख्या में अकर्मण्य लोग भरे हुए हैं, जो न ठोस काम करना चाहते हैं और न ही करने देना चाहते हैं। उनमें से अधिकतर लोग नितान्त अयोग्य हैं और चाटुकारिता के बल पर पदाधिकारी बने हुए हैं और सदस्य भी। ऐसे आयोग को हमारा सुझाव है, शोध-कर्म का नाम-परिवर्त्तित कर, आप लोग ‘चौर-कर्म’ कर दें, ताकि उसकी प्रामाणिकता स्वयं-सिद्ध हो सके।

पश्चिमी उत्तरप्रदेश में प्रायः प्रयोग होता है– आप कहाँ से आये हो? आप यह काम कबसे करोगे? आदिक।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ११ जनवरी, २०२१ ईसवी।)