★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
कर्म के दो रूप हैं :– प्रथम, नकारात्मक और द्वितीय, सकारात्मक। कर्म के तीन पक्ष हैं :– प्रथम, सैद्धान्तिक; द्वितीय व्यावहारिक तथा तृतीय, सैद्धान्तिक-व्यावहारिक। ये अनुभवजन्य मेरी मान्यताएँ हैं; इन्हें कोई अस्वीकार करता है अथवा तर्क-कुतर्क करता है तो मैं निष्प्रभावी रहता हूँ। आज इन तीनों की अवधारणाओं को समझने की आवश्यकता है।
ढाबों और अन्य प्रकार के शाकाहारी भोजनालयों में जब भी मैं भोजन करने (‘खाना खाने’ अशुद्ध शब्दप्रयोग है।) के लिए जाता हूँ तब अधिकतर भोजनालयों में ‘व्यावहारिक समाजवाद’ देखता हूँ। मैं भोजन ग्रहण करने के लिए एक भोजनालय में पहुँचता हूँ। जैसे ही कुर्सी पर बैठता हूँ, १३-१४ वर्ष का एक बालक पहुँचता है। वह मेज पर कपड़ा रगड़ते हुए प्रश्न करता है, “बाबू जी! क्या लेंगे?” बेटे! ”क्या-क्या है?” फिर वही उपलब्ध भोजन को गिनाने लगता है। मैं अपना मनपसन्द भोजन उसे बता देता हूँ।
सभी उसे ‘छोटू’ कहकर पुकारते थे। अगली बार वह जल लेकर आता है और गिलास भरकर चला आता है (यहाँ ‘जाता है’ का प्रयोग अशुद्ध है।)। मैं उससे पूछता हूँ, “बेटे! तुम्हारा अस्ली (अशुद्ध शब्द ‘असली’ है।) नाम क्या है?” वह घबरा जाता है और यह कहकर चला जाता है, “बाबू जी! रोटी निकल चुकी है; थाली लेकर आता हूँ।”
मैं उसका पीछा नहीं छोड़ता हूँ। दूसरी बार पूछता हूँ तब (यहाँ ‘तो’ का प्रयोग अशुद्ध है।) धीरे से कहता है,”बाबू जी! हम मुसलमान हैं।” “शाबाश बेटे! यह धरम-वरम मन का भरम है। तुम शान के साथ अपना काम कर रहे हो; किसी की गरदन तो नहीं काट रहे हो? अपने काम में लगे रहो।” उसका मन मेरी बातों में लगने लगता है, फिर वह कहता है, “बाबू जी! वो जो सलाद काट रहा है, वो भी मुसलमान है। मेरा पड़ोसी है। वही यहाँ मुझे लाया था।” जब वह तीसरी रोटी लेकर आया तब मैंने पूछा, “तो क्या बेटे! यहाँ सब मुसलमान ही हैं?” मेरे प्रश्न को लोकते हुए बोल पड़ता है, “नहीं बाबू जी। यहाँ ‘यादव’ भी है; ‘पटेल ‘भी; एक ‘चमार’ है। उसे लोग ‘पण्डित’ जी कहकर बुलाते हैं; ‘तिवारी’रोटी सेंकता है; मालिक पंजाबी है। उसी ने ‘रमबबुआ’ का नाम ‘पण्डित’ रखा है।” खटिकाना से दो औरतें आती हैं। वो जो बरतन साफ़ कर रही है, वही है।” वह खड़े-खड़े इस शैली में वर्णन कर रहा था कि कोई उसे ‘ऐसी-वैसी’ बातें करते हुए देख न ले। वह पलट कर उधर देख लेता था, जिधर उसका मोटा मालिक रुपये गिनने के लिए बैठा रहता था। यही कारण था कि मैंने किस्तों (यहाँ ‘किश्तों’ अशुद्ध है।) उसके साथ संवाद किया था।
“बेटे! तुम कहाँ तक पढ़े हो?” “बाबू जी! सात तक।” “आगे क्यों नहीं पढ़े?” “रुपये की किल्लत थी।” अब्बा नशेड़ी हैं। अम्मी सिलाई पर जाती हैं।”
मैंने उस बालक को ‘दस रुपये’ छुपाकर दिये थे। जिसका प्रभाव रहा कि वह रुचि लेकर जवाब देता रहा। मैं भोजन कर चुका था, फिर अपने मूल विषय के साथ जुड़ चुका था। मैं उस पूरे सभागार का बारीक़ी के साथ अध्ययन करने लगा। भोजन कर रही भीड़ में तिलक-चन्दन-कण्ठीधारी थे; तथाकथित दबंग परिवार भी दिख रहे थे, जो शानदार कारों से आये थे और उन-जैसे लोग भी, जो अपने दरवाज़े के सामने से किसी चमार-पासी-खटिक, काछी, कुर्मी आदिक की बारातें निकालने का विरोध करते हैं, यहाँ तक कि मारने-पीटने पर उतारू तक हो जाते हैं; जातीय दुर्भावना के कारण अपने कुएँ पर फटकने तक नहीं देते। वे सभी वहाँ होटल-मालिक से यह पूछने का साहस नहीं कर पाते– तुम्हारे होटल में किन धर्मों और जातियों के लोग काम करते हैं? ऐसा इसलिए कि वे सभी मन और बुद्धि के स्तर पर खोखले रहते (यहाँ ‘होते’ का प्रयोग अशुद्ध है) हैं।
वास्तव में, वहाँ मुझे वास्तविक समाजवाद दिखा था, साथ ही भारतीय समाज का ढकोसलावाद और व्यवहार भी। हमें इस दलदल से समाज को बाहर निकालना होगा; मगर कैसे?
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २१ अगस्त, २०२१ ईसवी।)