● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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क़र्ज़ तब लिया जाता है जब मन और हृदय मे उसे चुकाने की मंशा भी हो। यही कारण है कि उस क़र्ज़ को लेकर ‘अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष’ (आइ० एम० एफ०) अब गम्भीर हो गया है; क्योंकि उसके प्रमुख अधिकारियों ने समझ लिया है कि मोदी-सरकार उधार-पर-उधार लेती जा रही है तथा जब उसे वापस करने की बात कही जाती है तब चुप्पी साध लेती है। दूसरी ओर, स्थिति की गम्भीरता को दर-किनार करते हुए, मोदी-सरकार के पास एक ही जवाब रहता है :– अधिकतर क़र्ज़ भारतीय रुपये मे है, इसलिए उसे चुकाना कोई समस्या नहीं है।
वास्तविकता का बोध करते हुए, ‘अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष’ के अधिकारियों का मानना है कि यदि मोदी-सरकार इसी रफ़्तार से उधार लेती रही तो उसके देश पर जी० डी० पी० का १००% ऋण हो सकता है; वैसी स्थिति मे मोदी-सरकार-द्वारा ऋण की वापसी करना, मुश्किल हो जायेगा।
उल्लेखनीय है कि इस समय भारत पर कुल ₹२०५ लाख करोड़ से अधिक का ऋण चढ़ चुका है, जबकि मार्च, २०२३ ई० तक भारत पर कुल ₹२०० लाख का ऋण था। इस तरह से विगत ६ महीने मे ₹५ लाख करोड़ का क़र्ज़ बढ़ा है।
‘बिज़नेस स्टैण्डर्ड’ की रिपोर्ट के अनुसार, सितम्बर, २०२३ ई० मे भारत पर कुल ₹२०५ लाख करोड़ का क़र्ज़ हो गया है, जिसमे से ₹१६१ लाख करोड़ मोदी-सरकार पर तथा ₹४४ लाख करोड़ से अधिक का क़र्ज़ राज्य-सरकारों पर है।
आप क़र्ज़ लेने के खेल को इस तरह से समझें– वर्ष २०१४ मे केन्द्र-सरकार पर कुल क़र्ज़ ₹५५ लाख करोड़ रुपये था, जो मोदी-सरकार मे सितम्बर, २०२३ ई० तक बढ़कर ₹१६१ लाख करोड़ तक पहुँच गया था। इस गणित के हिसाब से देखें तो विगत ९ वर्षों के मोदी-सरकार पर १९२% ऋण बढ़ चुका है, जिसमे देश-विदेश, दोनो तरह के ऋण सम्मिलित हैं। वर्ष २०१४-१५ मे भारत पर विदेशी ऋण ₹३१ लाख करोड़ थे, जो कि वर्ष २०२३ मे बढ़कर ₹५० लाख करोड़ से अधिक बढ़ गया है।
मोदी-सरकार की वित्तमन्त्री निर्मला सीतारमण से संसद मे जब एक सांसद नागेश्वर राव ने सरकारी क़र्ज़ के बारे मे प्रश्न किया था तब उसका लिखित उत्तर देते हुए कहा था :– ३१ मार्च, २०२३ ई० तक मोदी-सरकार पर ₹१५५ लाख करोड़ से अधिक का ऋण है। हम यदि सितम्बर, २०२३ ई० की स्थिति को समझें तो विदित होता है कि मोदी-सरकार पर ₹१६१ लाख करोड़ से अधिक का क़र्ज़ हो गया है। इस हिसाब से साफ़ हो जाता है कि ६ माह मे मोदी-सरकार पर ₹५ लाख करोड़ का ऋण बढ़ा है; प्रतिशत के हिसाब से समझें तो मोदी-सरकार पर मात्र उक्त ६ माह की अवधि मे ४% का क़र्ज़ बढ़ा है।
हम यदि इसी क़र्ज़ को तुलना-स्तर पर देखें तो वर्ष २००४ मे यू० पी० ए० की मनमोहन सिंह की सरकार का गठन किया गया था तब भारत-सरकार पर कुल ₹१७ लाख करोड़ का ऋण था, जो वर्ष २०१४ तक तीनगुणा से अधिक बढ़कर ₹५५ लाख करोड़ तक पहुँच गया था। वर्ष २००५ से २०१३ तक (९ वर्षों मे) यू० पी० ए०-सरकार की कार्यावधि मे ₹२१ लाख करोड़ विदेशी क़र्ज़ लिये गये थे।
सितम्बर, २०२३ ई० मे भारत पर कुल ₹२०५ लाख करोड़ का ऋण चढ़ चुका है, जिनमे मोदी-सरकार और राज्य-सरकारों के ऋण भी जुड़े हुए हैं। हम यदि भारत की कुल जनसंख्या १ अरब ४० करोड़ मान लें तो हमे यह भी मानना पड़ेगा कि वर्तमान मे प्रत्येक भारतवासी पर ₹१ लाख ४० हज़ार से अधिक का क़र्ज़ है। मोदी-सरकार और राज्य की सरकारें यह भूल जाती हैं कि सरकारें जैसे ही ऋण लेती हैं वैसे ही उनका राजस्व घाटा बढ़ता जाता है। कोई भी सरकार तब कर्ज़ लेने के लिए बढ़ती है जब उसका व्यय आय से अधिक होती दिखायी दे। सरकार की आय कितनी है और व्यय कितना है, इसका गणित यह निर्धारित करता है कि सरकार अपने राजस्व-घाटा की प्रतिपूर्ति के लिए किससे कितना ऋण ले। इससे ज़ाहिर होता है कि सरकार का व्यय राजस्व से प्राप्त होनेवाली धनराशि से कहीं अधिक है, फिर राजस्व-घाटा तब अधिक दिखता है जब कोई सरकार ऋण मे प्राप्त धनराशि को वहाँ व्यय करती है, जहाँ से वापसी के दरवाज़े बन्द दिखते रहते हैं। आज मोदी-सरकार की ठीक वही स्थिति है।
मोदी-सरकार बिना क़र्ज़ चुकाये जिस गति मे ऋण लेती आ रही है और मुफ़्त की वस्तुओं को ग़रीबी के नाम पर लुटाकर महादानी दिखाने का उपक्रम करती आ रही है, उससे देश का वित्तीय घाटा तेज़ी मे बढ़ता जा रहा है। मुफ़्तख़ोरों को तैयार करने मे और उन्हें निश्शुल्क मे वस्तुएँ बाँटने की शुरुआत मोदी-सरकार के कार्यकाल से ही शुरू हुई है। इसी तरह से भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस और आम आदमी पार्टी ने अपने राज्यों मे निश्शुल्क वस्तुएँ देने की घोषणा कर विदेशी और स्वदेशी ऋणो के साथ महँगा मज़ाक़ किया है। निश्शुल्क दी जानेवाली वस्तुओं मे राशन, स्कूटी, मोबाइल, बिजली आदिक
मुख्य रूप से शामिल हैं। यही कारण है कि ‘अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष’ के अधिकारी इस बात को समझ चुके हैं कि जब तक मोदी-सरकार पर क़र्ज़-वसूली का दबाव नहीं डाला जायेगा, उससे क़र्ज़ वसूल पाना ”टेढ़ी खीर” है। क़र्ज़ तो संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, चीन आदिक देश भी लेते आ रहे हैं; लेकिन उनकी तुलना मे भारत अत्यधिक क़र्ज़ लेता आ रहा है। उक्त विकसित देश भारत की तुलना मे अत्यधिक सुदृढ़ हैं। उनके पास स्वत: अर्जित धनराशि है। हमे नहीं भूलना चाहिए कि आज डॉलर की आर्थिक विश्व मे विशिष्ट स्थान है, जिसका विश्व के कई देशों मे मुद्रा की तरह क्रय-विक्रय करने मे उपयोग किया जाता रहा है। ऐसी स्थिति मे उनके द्वारा विदेशी ऋणजाल से निकल पाना, बहुत आसान है, फिर वे देश ऋण अपने ही रिज़र्व बैंक से लेते आ रहे हैं। उनका डॉलर हर दिन सुदृढ़ दिखता आ रहा है, जिसके कारण उनका ब्याजदर भी घटता दिखेगा। जहाँ तक भारत का प्रश्न है, वह वैश्विक संस्थाओं वा जानी-मानी निजी कम्पनियों से ऋण लेता आ रहा है, जिसके कारण उसके लिए अत्यधिक दुष्कर होगा।
हमे नहीं भूलना चाहिए कि वर्ष २०२० मे कोरोना-महारोग-व्याप्ति के बाद से मोदी-सरकार समाज के एक विशेष वर्ग को ख़ुश करने की नीयत से भविष्य की स्थिति को बिना समझे-बूझे कई तरह की ‘सब्सिडी’ देती आ रही है, जबकि उस महारोग से देश का एक-एक व्यक्ति प्रभावित रहा है; कितने भारतीयों की मौत हुई थी, इसे बताने मे मोदी-सरकार कन्नी काटती आ रही है; करोड़ों की संख्या मे नौकरियाँ छिन ली गयी थीं। इस तरह से सरकारी सब्सिडी का हक़दार हर भारतीय है।
भारत की कुल जनसंख्या लगभग १ अरब ४० करोड़ मे से केवल ८० करोड़ लोग को हर माह निश्शुल्क खाद्यसामग्री, लगभग १० करोड़ महिलाओं को ‘उज्ज्वला योजना’ के अन्तर्गत निश्शुल्क गैस-सिलिण्डर, लगभग ९ करोड़ किसानो को प्रतिवर्ष ₹६ हज़ार तथा ‘प्रधानमन्त्री आवास योजना के अन्तर्गत २ करोड़ लोग को घर देने के लिए आर्थिक सहायता– इनके सच को यदि समीप से देखा जाये तो ये सारी योजनाएँ अभी अधूरी दिख रही हैं तथा घपलेबाज़ी अलग से; लेकिन सरकारी काग़ज़ पर पूरी दिखायी जा रही हैं। ये सब जाँच के विषय बनते हैं; परन्तु कौन-किसकी जाँच करेगा? हमाम मे तो सारे नंगे दिख रहे हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २४ दिसम्बर, २०२३ ईसवी।)