— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक–
आओ! हम ग़ौर करें, सदियाँ गुज़र रहीं,
ग़ुलाम तहज़ीब को, क्यों ढो रहे हैं हम?
दो–
तुमने कहा, मैंने सुना, हो जायें चुप अब हम,
दीवारों के कान, इधर तक सरक आये हैं।
तीन–
माना आप हसीन हैं, मगर इतनी भी नहीं,
अपने अदब में आबे कशिश और लाइए।
इज़्ज़त अवाम से है मिले, ख़ैरात में नहीं,
शीशे में अपनी सीरत, ज़रा उतार लाइए।
महब्बत चार दिन की नहीं, ताउम्र के लिए,
बेअदब को थूक दीजिए, तशरीफ़ लाइए।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १४ जून, २०२० ईसवी)
