साहित्यांजलि प्रज्योदि का ‘ग़ज़ल-गीत संगम’ सम्पन्न

“आज मौसम का रंग दोहरा है, धूप निकली और कोहरा है”

नगर की प्रतिष्ठित संस्था ‘साहित्यांजलि प्रज्योदि’ के तत्त्वावधान में ‘ग़ज़ल-गीत संगम’ का आयोजन ७ जनवरी को ‘सारस्वत सभागार’, लूकरगंज, प्रयागराज में किया गया। साम्प्रदायिक सद्भाव को जीवन्त करनेवाले इस सांस्कृतिक आयोजन में भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने अध्यक्षता की थी। अरबी-फ़ारसी के विद्वान् अनवार अहमद मुख्य अतिथि थे। प्रसिद्ध गीतकार अशोक सनेही विशिष्ट अतिथि रहे। आरम्भ में समारोह-अध्यक्ष ने दीप-प्रज्वलन कर कार्यक्रम का उद्घाटन किया था। मुख्य अतिथि ने सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण किया था।

प्रख्यात दोहाकार डॉ० प्रदीप चित्रांशी के ‘हम्द’ से ‘ग़ज़ल-गीत संगम’ का आग़ाज़ हुआ था। रुस्तम इलाहाबादी ने ग़ज़ल पेश की, “जिसने गुदड़ी में लाल रखा है, ख़ुद को मुश्किल में डाल रखा है।” विजयलक्ष्मी ‘विभा’ ने समय-सत्य ग़ज़ल सुनायी, “आज मौसम का रंग दोहरा है, धूप निकली है और कोहरा है।” एम०एस० ख़ान ने सामाजिक व्यवस्था के अत्याचार को यों बयाँ किया ,”तमाम ज़ब्त के पहलू निकल गये होते, जो तुम न होते तो आँसू निकल गये होते।” केशव सक्सेना ने अपनी भाव-प्रवणता को कुछ इस तरह से बताया, “मैं हूँ प्रेमपुजारी केशव प्रेमरस का प्याला हूँ।” रज़िया सुलतान ने हिन्दुस्तान की महत्ता इस तरह से पेश की, “स्वर्ग-जैसा मेरा यह हिन्दुस्तान है, यह ख़ूबसूरत चचा मियाँ का पानदान है।” तलब जौनपुरी ने ग़ज़ल पेश की, “मेरी बेबसी पे उनके दलायल कुछ और हैं, मेरी ज़िन्दगी के लेकिन मसायल कुछ और हैं।” अनवार अहमद ने सुनाया, “आस्था में कभी आभास में मिल जाऊँगा, मैं तुझे तेरे इतिहास में ही मिल जाऊँगा।” डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने ग़ज़ल पेश की,”गर ख़ता क़ुबूल हो तो कहो नफ़ासत लिख दूँ, पयामे इश्क़ के नाम इक वरासत लिख दूँ।” अशोक सनेही ने सुनाया,”तारों की बारात अधूरी लगती है, पूनम की सौग़ात अधूरी लगती है।” डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने पढ़ा, “दीवारें मस्जिदों की भी क़ुदरती साँस लेती है, इबादत में ख़ुदा की ये कलामे पाक गाती है।” विपिन दिलकश ने ग़ज़ल सुनायी,”तेरी झिझक भी ख़त्म हो मुझ पे अगर तू वार कर, दोस्त अनाड़ी हूँ बहुत, मुझको भी होशियार कर।” वर्षारम्भ के अवसर पर नगर की चर्चित शाइरा रज़िया सुलताना को समारोह के अध्यक्ष और मुख्य अतिथि ने सारस्वत सम्मान से सुशोभित किया। ‘ग़ज़ल-गीत संगम’ का संयोजन ज्योति चित्रांशी ने किया। विशेष सहयोग प्रशान्त चित्रांशी का रहा। प्रेमनारायण सेन ने अभ्यागतगण के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन किया। संचालन डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने किया।