‘साहित्यांजलि प्रज्योदि’ का ‘रसभीनी चदरिया’ महोत्सव सम्पन्न

बहारो! झूमकर आओ कि आज होली है

‘सारस्वत सभागार’, लूकरगंज, प्रयागराज १७ मार्च को विविध रंगों से सराबोर दिखा– आयोजन के केन्द्र मे वृत्ताकार सरोवर, जिसमे तैर रहे भाँति-भाँति के पुष्प होलिकोत्सव के अवसर पर गंगा-यमुना-तहज़ीब को विकसित करनेवाले कविसम्मेलन और मुशाइरा के रूप में दिख रहे थे, जिसे ‘साहित्यांजलि’ की ओर से आयोजित किया गया। इस समूचे महोत्सव की अध्यक्षता कर रहे भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “उत्सव और अवसर कोई भी हो, उस पर कवि और विचारक की मनोवृत्ति और उसका मनोविज्ञान झाँकता दिखता है; जैसा कि हमने अभी सुना, समझा और अनुभव किया है।”

महोत्सव का आरम्भ दीप-प्रज्वलन और सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण करके किया गया। लोकेश शुक्ल ने “जयति जय मानस विहारिणी” का गायनकर वाग्देवी का स्मरण किया। उसके बाद समारोह मे अध्यक्ष आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय और मुख्य अतिथि अनवार अब्बास को संयोजक डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने एक बड़ी पिचकारी और क्रमश: लौकी और कुम्हड़ा भेंट की थी।

मुख्य अतिथि अनवार अब्बास ने सुनाया– रंग और नूर की बरसात का दिन आया है, ज़िन्दगी तुझसे मुलाक़ात का दिन आया है। अजय मालवीय ने पढ़ा– होली के गीत को यहाँ पे हम सुनायेंगे, मुहब्बत के जाम को, यहाँ पे हम पिलायेंगे। फरमूद इलाहाबादी ने सुनाया– साली की पकड़ी जो कलाई होली मे, साढ़ू ने की ख़ूब धुनाई होली मे। शम्भुनाथ श्रीवास्तव ने सुनाया– गाँव-गाँव गली-गली, फूल और कली-कली, मादक वसन्त के तरंग मे समायी है। मदन कुमार ने सुनाया– तुझे दिल से कैसे जुदा करूँ, मेरा दिल है तुझसे बना हुआ। संचालन कर रहे डॉ० रवि मिश्र ने सुनाया– वो अक्सर खो देता है भीड़ की चाहत मे, भीड़ से अलग एक चेहरा। डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने दोहा पढ़ा– थोड़ी-थोड़ी आशिक़ी, थोड़ा-थोड़ा प्यार। समय देखकर कीजिए, मौसम के अनुसार।। डॉ० रामलखन चौरसिया की रचना थी– देख कोलाहल काग के, हंस हो गये मौन। अन्धों की बाज़ार मे, आँख ख़रीदे कौन।। आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने सुनाया– तोड़ कमण्डल मण्डल फेंको, प्रतिभा का सम्मान करो, समदर्शी जो पाठ पढ़ाये, गले लगाओ होली मे। लोकेश शुक्ल ने सुनाया– फगुनवाँ मे को मारे रस की धार। केशव सक्सेना ने सुनाया– जिनके संग हम ईद मनाते, वो मिलने आते होली मे। योगेन्द्र कुमार मिश्र ‘विश्वबन्धु’ ने सुनाया– होली के मौसम मे उड़ गया रंग, आदमी-आदमी हुआ है बदरंग। मुक्तकसम्राट पाल प्रयागी ने सुनाया– कैसे सुधरे बाबा कैसे सुधरे। इनके अतिरिक्त एस० पी० श्रीवास्तव, संजय सक्सेना, पं० राकेश मालवीय ‘मुसकान’ आदि ने रचनाएँ पढ़ीं। सुनील मिश्र ने आभार-ज्ञापन किया। इस अवसर पर ज्योति चित्रांशी, कुमुद, आलोक चतुर्वेदी, प्रेमसेन आदि उपस्थित थे।

अन्त मे, वरिष्ठ कवि-शाइर बुद्धिसेन शर्मा को भावांजलि अर्पित की गयी।