डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
सब कुछ उनका मुआफ़ हो गया,
मौसम बेचारा अब साफ़ हो गया।
कल तक गिलासभरी चाय पीते थे,
नोटबन्दी चलते वह भी हाफ हो गया।
उलफ़त का तक़ाज़ा समझ न सका,
जाने-अनजाने वह गुस्ताख़ हो गया।
चिलमन गिरा हमने बिस्मिला ज्यों किया,
अरमानों की होली में ख़ाक हो गया।
आओ! इस सवाल पर ग़ौर करें हम,
रफ़्ता-रफ़्ता कैसे सब साफ़ हो गया?