एक ग़ज़ल : सलीक़ा सीखकर भी वे ‘सीख’ न सके

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


आँखों-आँखों में, सलाम ले लिये,
बन्द होठों से वे, पयाम ले लिये।
लब थरथरा गये, मंज़र को देखते,
नज़रें ज्यों झुकीं, वे सलाम ले लिये।
होठ खुले, अधखुले, बन्द हो गये,
जाने कब वे मुझसे, कलाम ले लिये।
सलीक़ा सीख कर भी, वे ‘सीख’ न सके,
मौक़ा मिलते ही, वे बेलगाम हो लिये।
उनकी खुसूसियत, हर ज़बाँ पे रहती थी,
रफ़्ता-रफ़्ता जाने, कब वे आम हो लिये।
हुनर कभी उनका, बुलन्दियों पे था,
जाने-अनजाने कैसे, वे बेकाम हो लिये।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय; १७ जनवरी, २०१८ ईसवी)