डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
पिछले तीन वर्षों में गोरखपुर में स्वस्थ चिकित्सा-उपचार के अभाव में २० हज़ार शिशुओं, बालक-बालिकाओं तथा किशोर-किशोरियों की मृत्यु हो चुकी है। अब उन्हीं की क़ब्र पर उत्तरप्रदेश-सरकार ‘गोरखपुर महोत्सव’ मनाने जा रही है। एक ओर, हज़ारों माताओं की कोख उजड़ चुकी हैं और बद्दुवाएँ ‘गोरखपुर के वायुमण्डल’ में संचरण कर रही है, उन सभी की आहें व्यर्थ नहीं जानेवालीं।
आश्चर्य है, ठण्ढ से ठिठुरते सरकारी स्कूल के ‘सरकारी’ बच्चों के लिए नियमत: निश्शुल्क वितरण किये जानेवाले स्वेटर के लिए उत्तरप्रदेश की सरकार चलानेवालों के पास रुपये नहीं हैं; लाखों शिक्षित युवा बेरोज़गारों को नियोजित करने के लिए उसकी बुद्धि के ढक्कन खुल नहीं रहे हैं; विभिन्न कार्यालयों में रिक्त पड़े लाखों स्थानों को पूर्ति करने के प्रति कहीं-कोई चिन्ता नहीं दिख रही है; किसानों को ऋणमुक्त करने की दिशा में ठिठके क़दम बढ़ते नहीं दिख रहे हैं; दिन-अनुदिन उत्तरप्रदेश की बढ़ती बदहाली को दूर करने की कहीं-कोई फ़िक्र तक नहीं दिख रही परन्तु ‘गोरखपुर-महोत्सव’ के नाम पर ‘पूर्वांचल की राजनीति’ करने की घृणित चाल सामने आ चुकी है। उस आयोजन को करने के लिए करोड़ों रुपये ख़र्च किये जा रहे हैं। अब प्रश्न है, इतने रुपये आये कहाँ से? देश के शीर्षस्थ न्यायालय के न्यायाधीशगण स्वत: संज्ञान क्यों नहीं लेते?