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कर्नाटक भेदना भाजपा नेतृत्व के लिए क्या चुनौती है ?

नरेश दीक्षित (संपादक समर विचार)


कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री मोदी की साख से जुड़ गया है । गुजरात चुनाव के बाद दुसरी बार ऐसा हो रहा है जब देश का प्रधान मंत्री अपनी साख को बचाने के लिए पूरी सरकार को मैदान में उतार दिया हो । मोदी 2019 की राह कर्नाटक चुनाव के माध्यम से आसान करना चाहते है ।
यहाँ के चुनाव में कांग्रेस, भाजपा, जनता दल सेकुलर के बीच संघर्ष हो रहा है लेकिन अंतिम समय तक यह सिकुड़ कर राष्ट्रीय दलो के बीच रह जायेगा वैसे सभी दल 224 सदस्यीय विधान सभा में बहुमत हासिल करने का अपना – अपना दावा ठोक रहे है ।
दरअसल कर्नाटक राज्य में विभिन्न जातियों के मठ है जिनके बड़ी संख्या में अनुयायी है । इस राज्य में मुस्लिम वोटर भी 35 विधान सभा क्षेत्रो अपना प्रभाव डालते है । यहाँ दलित आवादी लगभग 20 फीसद है जो सौ सीटो पर अपना असर डालते है इसमें 36 सीटे अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है । कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे इसी समुदाय से आते है और इस समुदाय में उनकी मजबूत पकड़ भी है वैसे भी यहाँ के दलित वोटो पर कांग्रेस का अच्छा प्रभाव है ।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कन्नड भाषा का मुद्दा उछाल कर तथा कर्नाटक का अलग झंडा होने की, सरकार ने घोषणा कर कैविनेट से पास कराकर भारत सरकार के पास मंजूरी के लिए लिए भेज दिया है वही भाजपा ने इसे एक देश की अवधारणा के विरुद्ध बताने के कारण चुनाव में भाजपा को मुश्किल पेश आने लगी है । मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के चेहरे और राहुल गांधी के धारदार व जोशीले अभियान के बल पर कांग्रेस जहां सत्ता ब॔करार रखना चाहती है । वही देश में मोदी लहर जो गुजरात चुनाव के बाद कम होने लगी है येदियुरप्पा जैसे दागी चेहरे को मुख्यमंत्री घोषित कर चुनाव में उतार कर मोदी के भ्रष्टाचार मुक्त भारत अभियान की कलई खुल गई है ? जनता दल सेकुलर इस प्रयास में मेहनत कर रहे है यदि विधान सभा के चुनाव परिणाम हंग आते है तो किंगमेकर बनाने की तैयारी में लगे है ।
कर्नाटक विधान सभा चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा जोर शोर से उछाल जा रहा है लेकिन कोई भी दल दूध का धुलां जनता को नजर नही आ रहा है सिर्फ एक दुसरे पर आरोप – प्रत्यारोप तक सीमित है । वैसे देखा जाए कर्नाटक में सिद्धारमैया की छवि भाजपा के येदियुरप्पा से ज्यादा बेहतर है दुसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, सोनिया गांधी मोदी को लगातार घेरने में जुटे है वही मोदी अपने परंपरागत लच्छेदार भाषणों से कर्नाटक के मतदाताओ को लुभाने का प्रयास कर रहे है । कर्नाटक के चुनावी महासंग्राम में कांग्रेस यदि पुनः सत्ता में लौट आती है तो 2019 के संसदीय चुनाव में भाजपा की उल्टी गिनती शुरु हो जायेगी ?