चारा घोटाला-प्रकरण पर सी०बी०आई० के विशेष न्यायालय का निर्णय

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-


८९ लाख रुपये के घोटाले के प्रमुख अभियुक्त लालूप्रसाद यादव को राँची सी०बी०आई० के विशेष न्यायालय ने आज (६ जनवरी, २०१७ ई०) साढ़े तीन वर्षों का कारावास और □ १० लाख रुपये का भुगतान करने का दण्ड सुनाया है। □ १० लाख रुपये नहीं देने पर, उनकी छ: माह की अतिरिक्त सज़ा बढ़ जायेगी। अब लालू को इस न्यायालय से ज़मानत नहीं मिलेगी क्योंकि तीन सालों से अधिक कारावास का दण्ड मिलने पर जिस न्यायालय से दण्ड का निर्णय सुनाया जाता है, उस न्यायालय से ज़मानत नहीं मिलती, इसलिए लालू की ज़मानत के लिए उनके अधिवक्ता को उच्च न्यायालय में प्रतिवेदन प्रस्तुत करना होगा। लालू की ओर से अवस्था, एक ही अपराध के लिए अनेक बार कारावास का दण्ड भोगने तथा कई प्रकार के रोगों को बताकर ‘क्षमादान’ करने की प्रार्थना की गयी थी, जो बेअसर रही।
स्मरणीय है कि वर्ष १९९७ में लालू को ‘देवघर कोषागार से अवैध ढंग से ८९ लाख रुपये निकालने के लिए न्यायालय ने दोषी ठहराया था। इसके साथ ही फूलचन्द, महेश, राजाराम तथा आर०के० राणा को साढ़े तीन साल की सज़ा सुनायी गयी है।
अब इसका लालू को राजनीतिक लाभ मिलना तय है। लालू को जो सज़ा मिली है, वह कोई बहुत अधिक नहीं है। ऐसे में, उच्च न्यायालय से लालू को ज़मानत मिलने में कोई बहुत कठिनाई नहीं होनी चाहिए।
दूसरी ओर, समूचे बिहार में लालू की ओर से एक चिट्ठी जारी की गयी है, जिसमें जातिवादी ध्वनि नहीं है। समाज के समस्त जाति का प्रतिनिधित्व करता पत्र है क्योंकि लालू और उनके बेटे इस सच को समझने लगे हैं कि जातिवादिता से दूर रहकर, अब समग्र जाति-धर्म को साथ लेकर चलना पड़ेगा। यह आज तेजस्वी यादव के प्रेस कान्फेरेंस से भी सुस्पष्ट हो गया है।
बिहार के किसान, बेरोज़गार शिक्षित-अर्द्धशिक्षित युवा, व्यवसायी तथा सर्वहारा-वर्ग को लालू बिना किसी जातीयता के अपने पक्ष में लाना चाहेंगे क्योंकि वे सभी केन्द्र और बिहार-सरकारों की ग़लत नीतियों से प्रभावित होते आ रहे हैं।
लालू को यदि ज़मानत मिल जाती है तो केन्द्र और राज्य-सरकार के लिए संकट का बढ़ना तय है क्योंकि लालू अब अपने स्तर से, नरेन्द्र मोदी के सोच से विपरीत, ”सबका साथ-सबका विकास” को अपनाकर आगे बढ़ने का काम करेंगे, जो समय की आवश्यकता है और लालू के लिए विकल्परहित एक सार्थक रणनीति भी।