डॉ. आकांक्षा मिश्रा, बस्ती (उ. प्र.)
प्रेम में डूबकर जख्म खाई
लड़कियाँ आखिर हार जाती हैं ..।
जीवन का हर दाँव ,
संवरने से पहले ही बिखर जाती हैं ..।
जीवन से भी ;
मंजिल से भी
सहनशक्ति क्षीण होकर
खुद ही तय करती हैं
उस रास्ते को ,
जहाँ से वापस लौट पाना नामुकिन हैं ।
दर्द से भरी एक दास्ताँ लिख देती हैं
जीवन में खुद उसे उतार लेती हैं ,
अपने अधूरेपन में
एक बार फिर मुक्त करती हैं …
अपने अधूरे प्रेम को ;
बिना किसी नाम के ….
यह साहस नहीं क्षीणता हैं
चोट करती हो
एक बार फिर विश्वास पर !!
मौन की अभिव्यक्ति देकर
निश्छल जीवन की तरफ राग रहित ,
विहाग के पार
सहसा एक बार फिर
विदा अपने अकेलेपन से …….
प्रेम से जुदा !!
फिर अपने को खत्म कर देती हो यूँ ही ….
तय कर लेती हो खुद ही
अपने सारे जीवन का सफर
वह सफर अंतिम हो जाता है
तुम्हारे लिये ,
क्यों ? इतना दर्द समेट लेती हो
क्षणिक प्रेम के लिये
स्वयं का समर्पण करती हो
प्रेम उत्पन्न होने पर …..
सुनहरे ख्वाब बुनती हो
टूटते प्रेम में
सब कुछ नष्ट हो जाने पर
अभिधा तुम स्वयं को मुक्त कर देती हो
संशय भरे जीवन
और कुछ पलों में
अस्तित्व की परवाह किये बिना
खत्म खुद के साथ प्रेम को करती हो
हार का अनुसरण करके
गति को विराम देती हो
वैसे ही राग रहित ;
विहाग के पार सहसा एक बार फिर
विदा चुपचाप दे देती हो
बिना किसी आहट के
सिर्फ प्रेम में…. प्रेम में डूबकर ………।।