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दो मुँहे साँपों को बुरी तरह से कुचल डालो!

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

हमारे देश का शिक्षित बेरोज़गार सरकारी नौकरियों से हाथ धो रहा है। संघटित-असंघटित क्षेत्रों में भी नौकरी का टोटका सामने आ चुका है। रेलविभाग का निजीकरण आरम्भ हो चुका है।

इस विषय में दिलचस्प बात यह है कि एक ओर, किसी देश का रेलमन्त्री संसद् में रेलवे के निजीकरण का विरोध करता है, दूजे ओर, वही मन्त्री रेलवे के निजीकरण का समर्थन भी करने लगता है और लागू भी कर देता है। इसे कहते हैं, जीभर थूक कर बहुत ही चाव से उसे चाटते रहना।

१२ जुलाई, २०१९ ई० को रेलमन्त्री पीयूष गोयल ने राज्यसभा में कहा था– रेलवे का कभी निजीकरण नहीं होगा।

१७ अक्तूबर, २०१९ ई० को भी वही रेलमन्त्री पुन: कहता है– रेलवे के निजीकरण करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसी अफ़वाह उड़ा रहे लोग पत्रकार कहलाने के योग्य नहीं हैं। वह रेलमन्त्री ट्वीट भी करता है।

अब प्रश्न है– ऐसे झूठों के प्रति हम कैसे सम्मानसूचक शब्द का प्रयोग कर सकते हैं?

२५ दिसम्बर, २०१४ ई० को नरेन्द्र मोदी ने एक सार्वजनिक भाषण में कहा था– जो लोग अफ़वाहें फैला रहे हैं कि रेलवे का हम प्राइवेटाइजेशन करेंगे, उनसे बचकर रहिए। आप लोग से ज़्यादा मुझे रेलवे से प्यार है। मुझसे ज़्यादा आप रेल के विषय में नहीं जानते।

नरेन्द्र मोदी जब अपने भाषण में जिस शैली में रेल के प्रति आत्मीयता व्यक्त कर रहे थे, उससे तो यही अनुभव हो रहा था, मानो नरेन्द्र मोदी रेल के किसी डिब्बे में ही पैदा हुए हों।

बहरहाल, उसी झूठे प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्रित्व-काल में रेलवे का निजीकरण शुरू हो चुका है। ऐसे दोमुँहे साँप कितने विषैले होते हैं, परिणाम-प्रभाव सामने है। देश में कभी ऐसा होगा, जब ऐसे दोमुँहों को पूरी और बुरी तरह से कुचला जाये?

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ७ सितम्बर, २०२० ईसवी।)