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आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

हमारी पाठशाला के विद्यार्थी ‘पानी’ शब्द का प्रयोग प्राय: पेय-अपेय जल के रूप में करते आ रहे हैं और बहुत हुआ तो दो-चार कहावतों-मुहावरों के रूप में या फिर ‘पर्यायवाची’ के रूप में पढ़-लिखकर अपने प्रयोजन की सिद्धि कर लेते हैं। ‘पानी’ की उपयोगिता-महत्ता यहीं तक सीमित नहीं है।

यहाँ हमने निम्नटंकित पंक्तियों में ‘पानी’ के अस्तित्व का बृहद्-विशद विग्रह प्रस्तुत किया है, जिसकी शैली और संरचना नितान्त मौलिक है।

अब आप एक ‘पानी’ शब्द की परिव्याप्ति पर दृष्टि-निक्षेपण करें।

पानी-पानी करता ‘पानी’

गवाही दे रहा
आँखों का मरता पानी
उतरते पानी का।
पानी-पानी होकर भी
पानी बचाने की चिन्ता से दूर
पानी में छपाक्-छपाक् खेलता वह शख़्स।
पानी में अपना पंकिल अक्स देखकर
उसे ख़याल आता है,
अपने प्रतिद्वन्द्वियों के पानी उतारने का।
वह अपनी अँजुरी पानी में डुबोता है,
इस आशा में,
शायद पानी के बताशे बन जायें।
वह तान्त्रिक नहीं,
फिर भी अपनी बातों पर
पानी चढ़ाने में वह माहिर रहा है।
वह दिखाता तो पानी है
पर गटागट चढ़ा लेता है गले के भीतर।
वह मनका फेरता नहीं, मनका सुनाता है,
आत्मकेन्द्रित तुच्छ स्वार्थों के लिए
वह पानी पढ़ता/परोरता/ फूँकता है।
वह अपनी अस्लीयत से नावाक़िफ़ नहीं;
तभी तो पानी पर नीवँ बनाता आ रहा है।
निम्नता की सीढ़ी चढ़ने और उतरने में
उसे हासिल है, दक्षता,
तभी तो वह वेवजह पानी करता आ रहा है।
उसका अविवेक स्वत: सिद्ध होने लगता है
क्योंकि वह पहले पानी पीता है
फिर जाति पूछता है।
परिणाम-प्रभाव प्रत्यक्ष है;
अब वह पानी पी-पीकर कोस रहा है।
उसका उद्धत और उद्दण्ड स्वभाव
परिलक्षित होता आ रहा है
वह बिना विचार किये किसी के भी सिर पर
पानी मारता चला आ रहा है।
वह निर्दय-निर्मम जानता है,
कौए की जीभ चुभलाकर मौत को शिकस्त दे देगा
जबकि उसकी भी पानीभरी खाल है।
सच तो यह है कि वह पानी से भी पतला है।
विगत का दशक साक्षी है,
वह पानी से पहले पुल, पाड़ बाँधकर
बेफ़िक्र होता आया है;
क्योंकि उसकी आँखों का पानी मर चुका है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३१ मार्च, २०२१ ईसवी।)