प्रश्न:-
लोग कहते हैं मृत्यु एक सत्य है।
तो जीवन को सत्य क्यों नही कहा जा सकता…?
इस ब्रह्माण्ड में जीवन भी तो है
तो फ़िर जीवन क्यों नही सत्य है..?
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उत्तर:-
सत्य ही तो जीवन है।
जीवन ही शाश्वत और सनातन है।
लेकिन मूर्खों और धूर्तों ने मृत्यु को सत्य घोषित और प्रचारित कर दिया है पूरी दुनिया में।
मनुष्य को जीवन के स्थान पर मृत्यु का उपासक बना दिया।
जिससे सभी लोग क्रूर हो गए।
जीवों की निर्मम हत्याएँ होने लगीं।
मृत्यु के उपासक ही माँसाहारी हो गए।
दूसरों को मारकर खा जाना भी साधारण बात हो गयी।
मृत्यु को सत्य मानकर उसकी उपासना ही संसार में शैतानी तांडव नर्तन का मूल है।
दुनिया में मृत्यु के उपासकों ने ही ब्रह्मा को सत्य कहने के बजाये शिव ही सत्य है का गीत गाना प्रारम्भ कर दिया।
शिव मृत्यु के देवता है।
वे संहारकारी है।
इसीलिए आजकल शिव के उपासकों की संख्या अधिक बढ़ गयी है।
और ब्रह्मा की उपासना लगभग समाप्त हो गयी है।
इसीलिए दुनिया में ब्रम्हा जी का केवल एक मन्दिर
और शिव जी के असंख्य मंदिर बन गए…!
मृत्यु के उपासक हिंसक लोगों ने ही अपने नामों में भी सिंह लिखना प्रारम्भ कर दिया है।
जबकि पहले कभी ऐसा नामकरण प्राचीन भारतीय संस्कृति में नहीं था।
लेकिन अब समय बदल रहा है।
अब ब्रह्मा जी के उपासकों की संख्या बढ़ेगी तीव्र गति से।
ब्रह्मा जी के उपासक देवता होते हैं।
विष्णु जी के उपासक मनुष्य होते हैं।
शिव जी के उपासक दैत्य होते हैं।
क्योंकि….
ब्रह्मा जी देवलोक के अधिपति हैं।
विष्णु जी मनुष्यलोक के अधिपति हैं।
शिव जी दैत्यलोक के अधिपति हैं।
ऐसा ही पुराणों का कथन है।
ब्रह्मा, विष्णु और शिव ही क्रमशः सृजन, पालन और संहार के देवता हैं।
मनुष्य जिस भी प्रवृत्ति का होता है वैसे ही देवता की उपासना करता है।
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-(राम गुप्ता – स्वतंत्र पत्रकार – नोएडा)