जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद-

पथ बड़ा विचित्र है चित्र बना मौन है,
रागिनी सशंक है मैं गीत गुनगुना रहा।
ख्वाहिशों की बगुलियाँ हो रही अधीर हैं,
मैं कर्म के प्रभाव से दाना चुना रहा ।
शब्द लिए टोकरी बोझ हैं उठा रहे,
भीगे हुए रस सभी ओंठ हैं सुखा रहे!
मन्दिरों की सीढ़ियों में मन्त्र हैं जड़े हुए,
भाव साथ छोड़ के दिल मेरा दुखा रहे!
मन अटल सा बढ़ रहा वर्जना के द्वार तक,
मैं श्वास के प्रवाह से कुण्डियाँ बजा रहा!
भावना की ओट में वर्ण शिथिल हो रहे,
दुर्जनों की चोट से राह जटिल हो रहे!
छल कपट से ये मुझे रोकते हैं सदा,
वेग मेरा रोकने के प्रयास कुटिल हो रहे!
दुश्वारियों का उफ़ान है हृदय को तोड़ता,
मैं हौसले की नाव को अनवरत बढ़ा रहा!