उस उपवन को जल देकर ,वृथा समय बरबाद न कर ।
जिस उपवन में केवल काँटे वाले पेड़ पनपते हों ।।
जहाँ अँधेरो की पूजा हो ,दीपक का उपहास बने ।
सारे श्रोता पटु वक्ता हो, गूँगा कोई व्यास बने ।।
जहाँ सुनहरे वर्तमान की बलि अतीत को दी जाये ।
ऐसी अंधनीति हो तो फिर,क्या स्वर्णिम इतिहास बने ?
वह तरुवर तो सूखेगा ही,जिसपे बगुले रहते हों।
उस उपवन को……………………………
पक्षपात हो आँख मूँदकर,प्रतिभा का सम्मान न हो।
बगुले बनें मराल ,भले ही नीर क्षीर का ज्ञान न हो ।।
जहाँ निशा के आखेटक कुछ उल्लू यही मनाते हों ।
निष्कंटक हो राज्य हमारा चाहे भले विहान न हो ।।
जहाँ रोज मेहनत करने वालों के सपने ढहते हों ।
उस उपवन को जल देकर ,वृथा समय बरबाद न कर ।
डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी