आचार्य द्विवेदी जी की प्रासंगिकता सर्वकालीन है– विभूति मिश्र
सारस्वत मंच ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज के तत्त्वावधान मे द्विवेदी-युग के प्रथम पुरुष आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी जी की जन्मतिथि १५ मई के अवसर पर ‘सारस्वत सभागार’, लूकरगंज, प्रयागराज मे ‘आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी जी की समग्र सारस्वत यात्रा की प्रासंगिकता’-विषयक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया था।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए, हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमन्त्री विभूति मिश्र ने कहा– आचार्य द्विवेदी जी की प्रासंगिकता सर्वकालीन है। उन्होंने साहित्य, ज्ञान-विज्ञान, पत्रकारिता आदिक विषयों मे जिस स्तर का लेखन किया है, वह दुर्लभ है।”
मुख्य अतिथि डॉ० सरोज सिंह का मत था– आचार्य द्विवेदी का मानना था कि सम्पादक को साहित्य और समाज की आलोचना करनी चाहिए। अपनी पुस्तक ‘सम्पत्तिशास्त्र’ मे उन्होंने भारत की निर्धन जनता और कृषकों की समस्याओं को उठाते हुए, अँगरेज़ी-साम्राज्य की नीतियों की आलोचना की।
विशिष्ट अतिथि डॉ० धारवेन्द्रप्रताप त्रिपाठी ने बताया– आचार्य द्विवेदी ने खड़ीबोली ‘हिन्दी’ को पद्य और गद्य अर्थात् हिन्दी-साहित्य की भाषा बनायी, साथ ही दूसरी भाषाओं के विभिन्न विषयों के हिन्दी-अनुवाद और हिन्दी को जनमानस तक सहजता से पहुँचाने का अविस्मरणीय योगदान किया था।
डॉ० राजेश गर्ग ने कहा– महावीरप्रसाद जी साहित्य-सेवा के लिए सर्वस्व त्याग कर वीरव्रत धारण करने मे अग्रणी रहे हैं। पत्रिका-सम्पादन हो; काव्य हो; गद्य हो, सर्वत्र उनकी लेखनी चली है।
डॉ० मुदिता त्रिपाठी ने बताया– द्विवेदी जी स्थापित करते हैं कि भावों और विषय मे परिवर्त्तन से भाषा मे परिवर्त्तन होता है। वे रीतिकालीन मानकों को ख़ारिज़ करते हुए, लोकमंगल के उद्देश्य से नये मानक स्थापित करते हैं।
डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने कहा– आचार्य द्विवेदी जी ने रेलविभाग की नौकरी को छोड़कर साहित्य-सेवा करने का जो संकल्प किया था, वह उनके आत्मबल का द्योतक था।
आयोजक-संचालक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा– दु:ख का विषय है कि आचार्य द्विवेदी जी ने भाषा-परिष्कार करते हुए, जिस पथ का प्रदर्शन किया था, उसकी आज भी उपेक्षा की जा रही है। इतना ही नहीं, बताने-समझाने की प्रक्रिया के साथ जुड़ने मे सुशिक्षितजन अपना अपमान समझते आये हैं, जो कि शोचनीय स्थिति है।
उर्वशी उपाध्याय ने कहा– अनेक सिद्ध साहित्यकार जो आज साहित्य के प्रतीक हैं, उनकी साहित्यिक पत्रकारिता की देन हैं।
डॉ० पूर्णिमा मालवीय ने कहा– आचार्य द्विवेदी ने भारतेन्दु-युग के बिखराव को समीप से देखा और ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से साहित्य मे आये स्खलन को दूर करते हुए एक मानदण्ड स्थापित किया।
रणविजय निषाद का मत था– भारतेन्दु-युग के लेखकों और साहित्यकारों-द्वारा व्याकरण के नियमो की उपेक्षा की जाती थी, जिसे आचार्य ने शब्दानुशासन के द्वारा द्विवेदी-युग मे समृद्ध किया।
सविता शुक्ला का कहना था– द्विवेदी जी ने हिन्दी-साहित्य के माध्यम से ही राष्ट्रीय चेतना की भावना जनमानस तक पहुँचायी थी।
सम्पदा मिश्रा ने कहा– उन्होंने हिन्दी-निबन्धों के माध्यम से साहित्य की श्रीवृद्धि मे महत् योगदान किया था।
सुनील मिश्र ने कहा– द्विवेदी जी ने हिन्दी-भाषा, साहित्यकार, भाषा, व्याकरण, पत्रकारिता आदिक क्षेत्रों मे महत्त्वपूर्ण कार्य किये हैं।
इसी अवसर पर समस्त सहभागियों को हिन्दीभाषा-साहित्य की आलोचनात्मक पुस्तक ‘समीक्षा के वातायन’ (लेखिका– डॉ० अलका प्रचण्डिया) भेंट की गयी।
इस समारोह को सम्पन्न कराने मे ज्योति चित्रांशी की विशेष भूमिका रही। इस अवसर पर विनय त्रिपाठी, चारुमित्र, देवेन्द्रप्रताप सिंह, राकेश मालवीय, प्रेमसेन आदिक उपस्थित थे।