आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का संदेश

मनुष्य ठहरी हुईं और गतिमान् मान्यताओं के साथ न्याय नहीं कर पाता है; क्योंकि गतिशीलता के ‘कु’ और ‘सु’ पक्षों से वह प्रभावित तो होता है, जबकि ‘ठहराव’ के प्रति उदासीन बना रहता है। ध्यातव्य (ध्यान करने-योग्य) है कि ठहराव सदैव ‘नेपथ्य’ का विषय होता है।

प्रायः सभी का मत है कि सागर मे जो सरिताएँ समा जाती हैं, वे एकलय हो जाती हैं; एकाकार हो जाती हैं; एकरूप हो जाती हैं; एकान्वित हो जाती हैं तथा तद्रूप हो जाती हैं। ऐसे मे, उनका जल-प्रवाह नैसर्गिक और मौलिक रह नहीं जाता; किन्तु मेरा मन्तव्य है कि जिस सरिता की इच्छाशक्ति वेगवती और बलवती होती है, वह सागर में विलय हो जाने के अनन्तर भी अपने स्वतन्त्र अस्तित्व की पुन: प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहती है और विचलन और आन्दोलन-पथ पर चलते-चलते, वह एक दिन अपना अभीष्ट मार्ग प्रशस्त कर जाती है, फिर कल-कल छल-छल निनादिनी के रूप मे स्वछन्द मति-गति-रति के साथ अपनी स्वतन्त्र सत्ता स्थापित करने मे वह पूर्णतः सफल बन जाती है।

आप इस सत्य को अंगीकार करें कि सिन्धु मे ‘बिन्दु’ का अस्तित्व बना रहता है; क्योंकि ‘बिन्दु’ के बिना ‘सिन्धु’ का अस्तित्व नहीं रहता (यहाँ ‘होता’ अशुद्ध है।)।

एक स्थावर प्राचीर दसों दिशाओं से आनेवाले प्रभंजन और वात-चक्र (चक्रवाति) की मार खाता रहता है; किन्तु वह अपनी सहिष्णुधर्मिता का परित्याग नहीं करता, फिर मनुज (मनुष्य) तो ‘जगन्नियन्ता’ (जगत्+नियन्ता– व्यंजन सन्धि) (‘जगद्नियन्ता’ अशुद्ध है।) की अप्रतिम जंगम (चलायमान) कृति है। आपकी अन्तश्चेतना मे अनुक्रिया-अभिक्रिया-प्रतिक्रिया करने की प्रबल सामर्थ्य है; मन है; वाणी है; कर्म है तथा लौह-सदृश दृढ विश्वास और निश्चय भी।

विलम्ब क्यों? चिन्तन-मनन-विचार के प्रति कृपणता क्यों? इस ज्ञानरूपी महासागर की शब्द-राशि को प्रणाम करते हुए, इसके तल मे पैठें और नवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा का अवलम्बन लेते हुए, ज्ञानरत्न-निधि को लेकर बाहर आयें, तदनन्तर (‘तद्नन्तर’ और ‘तदन्तर’ अशुद्ध हैं।) उसकी द्युति से सम्पूर्ण लोक को कान्तिमान् करें; चमत्कृत करें।

उठे!-जागे! और लक्ष्य-संधान की दिशा में प्रवृत्त हो जाये! (यह इच्छाबोधक वाक्य है।) — यही मनुष्य-मनुष्य का उद्देश्य, ध्येय तथा लक्ष्य होना चाहिए। इसी मूल मन्त्र मे ‘सत्’, ‘चित्’ तथा ‘आनन्द’ (सच्चिदानन्द) निहित हैं। आप इन तीनो आत्मिक तत्त्वों के प्रति अन्वेषणात्मक, गवेषणात्मक तथा शोधात्मक दृष्टि-निक्षेपण करने की सामर्थ्य अर्जित करें, जिसके लिए आपको ‘अध्यवसाय’ का आलम्बन चाहिए; इसके लिए ‘सुदृढ़ इच्छाशक्ति’ और ‘प्रतिबद्धता’ को अपना ‘मित्र’ बनाना होगा, जो प्रत्येक प्रवास (‘पड़ाव’ का तत्सम रूप) पर आपका परीक्षण करता अनुभव होगा। परीक्षा की ऐसी घड़ी मे ‘धर्म’ (कर्त्तव्य) और ‘धैर्य’ आपके सहचर के रूप मे आभासित होता रहेगा।

हम इसके लिए कृत-संकल्प (जिसने किसी कर्म को करने के लिए दृढ़ इच्छा कर ली हो– बहुव्रीहि समास) हैं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २ जून, २०२२ ईसवी।)