★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक–
रूप-रंग की हाट में, तरह-तरह तस्वीर।
राँझा बिकते हैं कहीं, कहीं बिक रहीं हीर।।
दो–
धर्म पंथ औ’ जाति की, बिगड़ गयी है रीति।
ऐसे में कैसे भला, सब तक पहुँचे प्रीति।।
तीन–
रुपया-रुतबा-रूपसी, बहुत भयंकर रोग।
सत्ता-धर्म गले मिलें, अजब-ग़ज़ब संयोग।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १७ अक्तूबर, २०२१ ईसवी।)