
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
अटलबिहारी वाजपेयी जी और नरेन्द मोदी जी में तुलना-स्तर पर ‘ज़मीन और आसमान’ का अन्तर है। अटल जी में कूट-कूटकर ‘मनुष्यता’ भरी हुई थी। वे सच्चे अर्थ में ‘राष्ट्रवाद’ के पोषक थे। देश के समस्त विपक्षी दलों को अपनी सत्ता के साथ जोड़कर, वे ‘राष्ट्रवादी सरकार’ का गठन करना चाहते थे। देशहित से सम्बन्धित गम्भीर विषयों पर वे सर्वदलीय बैठक कर विचार आमन्त्रित करते थे। क्या आज ऐसा दिख रहा है?
सत्ता से पृथक् होने के बाद नरेन्द्र मोदी जी ने अटलबिहारी वाजपेयी जी और लालकृष्ण आडवाणी जी की कितनी उपेक्षा की थी, इसे भी आज समझने की आवश्यकता है। जो राजनेता अटल जी और आडवाणी जी के निकटस्थ थे, उन्हें मोदी जी ने उपेक्षित किया है; क्योंकि मोदी जी को यदि किन्हीं दो व्यक्तियों से डर था तो वे थे— अटल जी और आडवाणी जी।
अटल जी ने राजसत्ता को अपना नहीं माना था और न ही सत्ता के प्रति किसी प्रकार का विकृतिपूर्ण मोह था। वे अकस्मात् अनियमितताओं को झटककर दूर निकल आया करते थे; जबकि मोदी जी चिपके हुए हैं।
अटल जी सार्वजनिक पुरुष थे; वे राष्ट्र के लिए जीते थे, ठीक उसके विपरीत, नरेन्द्र मोदी जी की आचरण की सभ्यता रही है। यही कारण है कि जब उनकी मृत देह की यात्रा निकाली जा रही थी तब उसमें जिनकी भागीदारी रही थी, उसके अन्तर्गत सम्प्रदाय, सद्भाव, जाति-वर्गादिक की गंध ‘रहित’ लक्षित हो रही थी और सार्वजनिक सदाशयता का समूह मुखमण्डल की एक झलक पाने के लिए सुदूर अंचलों से आता रहा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १७ अगस्त, २०१८ ईसवी)