नास्तिक और आस्तिक की अवधारणा

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

सच तो यह है कि इस लोक मे कुछ भी ‘नास्ति’ (न+अस्ति=नास्ति) नहीं है; सब कुछ ‘सास्ति’ (स +अस्ति=सास्ति) है। नास्तिक तो कोई भी नहीं है। सुशिक्षित समाज इन दोनो ही शब्दों को ‘ईश्वर’ और ‘परलोक-दर्शन’ से सम्बद्ध करके देखता है, जो कि व्यावहारिक संदर्भों मे ‘मिथ्या’ है।

हमारे यहाँ ‘प्रदर्शनमात्र’ को ‘धर्म’ माना गया है, जो कि ‘लौकिक’ है। हम जिन गुणो को धारण करते हैं, वह ‘आत्मिक’ है और वही ‘वास्तविक’ धर्म है। सत्य, अहिंसा, प्रेम, श्रद्धा, करुणा, दया, अनुकम्पा, परोपकार, दया-दानशीलता, क्षमाशीलता, सहिष्णुता, साहस, त्याग, सेवा-सत्कार, अध्यवसाय, दूर दृष्टि आदिक उदात्त गुण ‘धर्म’ की कोटि के अन्तर्गत रेखांकित होते रहते हैं। हम चाहकर भी इनका प्रत्यक्षीकरण करते हुए, बाह्य जगत् (यहाँ ‘वाह्य’ अशुद्ध है।) के साथ जोड़ नहीं सकते। मनुष्य जिन दुर्गुणों को अपने मन-मस्तिष्क के साथ जोड़े रहता है, वह ‘अधर्म’ कहलाता है। किसी आराध्य की पूजा करना, मनुष्य की अपनी ‘आस्था’ है; श्रद्धा है और विश्वास भी। इस लोक मे जो कुछ भी दिख रहा है, वह ‘आस्तिक’ के अन्तर्गत आता है और जो कुछ भी लक्षित नहीं हो रहा है और उसके बाद भी यदि कोई असत्य कह रहा हो कि उसे दिख रहा है, वह ‘नास्तिक’ है। भारतीय दर्शन मे आस्तिक-नास्तिक के प्रकार दिये गये हैं, जो कि व्यक्तिपरक चिन्तन का परिणाम है। हम ऐसे वर्गीकरण को महत्त्व नहीं देते; क्योंकि हमारा भी दर्शन है, जो कि व्यावहारिक है। उसके साथ किसी की असहमति-सहमति का कोई प्रश्न ही नहीं है। पुस्तकीय ज्ञान के अनुसार, जो ईश्वर और परलोक को मानता हो, वह ‘आस्तिक’ है और जो न मानता हो, वह ‘नास्तिक’ है। ये दोनो ही अवधारणाएँ कर्मकाण्डमूलक हैं, जो आध्यात्मिक/आत्मिक संदर्भ से नितान्त परे हैं। जीवन का व्यावहारिक पक्ष, जो कि पूर्णत: पारदर्शी है, बताता है कि इस जगत् का संचालन एक ‘अदृश्य’ शक्ति करती आ रही है, वही विश्वव्यापिनी और जगन्नियन्ता है। आप अपने सुविधानुसार (‘अपनी सुविधानुसार’ अशुद्ध है।) उसे ईश्वर, ख़ुदा, वाहे गुरु, परमेश्वर आदिक का नाम रख सकते हैं, जो कि आपके आस्था, श्रद्धा तथा विश्वास का विषय हो सकता है। वह व्यष्टिमूलक है, जबकि “धारयति इति धर्म:” (जो धारण करनेयोग्य/करने-योग्य/करने के योग्य है, वह धर्म है।) ‘समष्टिमूलक’ है।

अब रहा विषय ‘परलोक’ मे विश्वास करने का तो सुस्पष्ट है कि उसे किसी ने भी नहीं देखा है। ऐसे मे, मात्र पुस्तकीय ज्ञान के आधार पर यह कैसे माना जा सकता है कि इह लोक के अतिरिक्त दूसरा भी कोई लोक है। हम यदि ऐसी धारणा प्रस्तुत करते हैं तो संकुचित मन: स्थिति के लोग हमे ‘नास्तिक’ कहने लगेंगे। आप ऐसे लोग से यदि प्रश्न करेंगे– ‘परलोक’ को किसी ने देखा है? ऐसे मे, उनका उत्तर रटा-रटाया रहेगा– पौराणिक ग्रन्थों मे उसके विषय मे बताया जाता है।

इससे एक विषय-विन्दु सुस्पष्ट हो जाता है कि कथित ‘धर्म का कीड़ा’ मनुष्य के मन-मस्तिष्क मे इतनी गहराई मे आकर पैठ चुका है कि उससे मुक्ति पाना सहज नहीं दिखता। इस कीड़े की समाप्ति करने के लिए ‘संवाद-द्वार’ को अनावृत करना होगा, जो किसी ‘ललकार’ से कम नहीं है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २१ अगस्त, २०२२ ईसवी।)