‘जड़ मानव’ को समझने की आवश्यकता

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


आज के अधिकतर कलमधारियों और छद्मवेशी साहित्यकारों की न तो कोई रचना-पद्धति है; न रचना-शैली है और न ही रचना-प्रक्रिया, फिर चिन्तन-मनन तो दूर की बात। उनके सर्जन में भाव-दर्शन होता है किन्तु नितान्त कुत्सित, गर्हित तथा जुगुप्सा उत्पन्नकरने वाला। उनका लक्ष्य स्पष्ट है, दूसरे के हक़ को शातिराने अन्दाज़ में हथिया लेना।

राजनीतिमूलक राष्ट्रवाद की व्यष्टिवादिता ही आज के साहित्य-जगत् में परिव्याप्त है। यही कारण है कि साहित्य ‘साहित्य के लिए’ वाली भावना से मानवता ग्रस्त हो गयी है और वहाँ पर ‘राहित्य’ ने स्थान ले लिया है। मानव का सारा रस सूख गया है। आज ऐसे सर्वलोक समन्वययकारी विश्व-साहित्य की आवश्यकता है, जो ‘जड़-मानव’ के ‘ठूँठ-मानव’ में रस का संचार कर सके।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ६ मार्च, २०१८ ई०)