जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद)

मैं प्रेम पथिक आवारा भँवरा, काँटों से भी प्यार करूँ,
अधर लिखें चुम्बन की पाती, नयनों से संवाद करूँ।
ऋतु वसंत की मादकता हो, या पावस के भारी दिन,
उर में बजती नित सरगम, साँसों से प्रिय याद करूँ।
हरिण हारिणि चाल तेरी, नयनों की मदरिम चञ्चलता,
चहके जब सोन चिरैय्या-सी, मैं भावों का अनुवाद करूँ।
शब्दार्थ कहाँ टंकित करता, मन-मन्दिर में ही लिख डाला,
इस प्रेम-वाटिका में रतिके! अन्तर्मन में न विषाद करूँ।
प्रेम प्रतिज्ञा अटल मेरी, प्रतिकार मुझे न आता है,
मन सुमन तेरा नित मुदित रहे, ईश्वर से ये फ़रियाद करूँ।