कैसे रामभक्त हैं, कुर्सी से सटने लगे!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

बातों-ही-बातों में, ‘आदर्श’ अब बँटने लगे,
जनाब को देखो, मुद्दों से, कैसे हैं हटने लगे!
राम तो राजसिंहासन, त्याग कर आगे बढ़े,
कैसे रामभक्त हैं, जो कुर्सी से सटने लगे!
आश्वासन देते रहे, पर एक न पूरा कर सके,
जन-जन की नज़रों में, क़द अब घटने लगे।
बेहयाई, बेशर्मी आकाश से, बातें हैं कर रहीं,
‘हम-ही-हम दिखते रहें’, मन्त्र यह जपने लगे।
‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’, मुँह बाये है खड़ा,
माँ-बाप असुरक्षा से, अब हैं बहुत डरने लगे।
‘विकास’ की कहानी, ‘आईसीयू’ में घुट रही,
विश्वासघाती-कर्म उनके, यहाँ हैं सड़ने लगे।
इकहत्तर साल का बूढ़ा, बहुत है सहमा हुआ,
राष्ट्रधर्म नीलाम करने की, रियाज़ करने लगे।
वर्षों से अदालत के, कठघरे में राम हैं उनके,
भूल गये ‘रामभूमि’, ‘आरक्षण’ अब रटने लगे!
अनाचार, अत्याचार, पापाचार, कदाचार यहाँ,
‘रामराज’ का पाठ, बेईमान मिल रटने लगे।
महँगाई की आग में, जनता झोंकी जा रही,
क्रोध में, आक्रोश में, लोग अब फटने लगे।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय; ४ जुलाई, २०१८ ई०)