जनाब! अर्ज़ करता हूँ; बज़्मे कोठा का आग़ाज़ करता हूँ

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

बज़्मे-महफ़िल की शान है कोठा,
दौलत औ’ हुस्न का ईमान है कोठा।
यों ही कोई रक़्क़ाशा बनती भी नहीं,
लाचारी-मज्बूरी का नाम है कोठा।
तवायफ़ का जिस्म रंगीनिये-शवाब,
रंगीनिये-हयात की पहचान है कोठा।
रंगीनिये-तबस्सुम का असर तो देखिए,
रंगीनिये-निगाह पे क़ुर्बान है कोठा।
रंगीमिज़ाजी का अब आलम न पूछिए,
रंगीनिये-बहार की मुसकान है कोठा।
रंगीनिये-माहौल से मुँह न छुपाइए,
रंगीनिये-तहज़ीब का इनाम है कोठा।
रंगी लिबास हुस्न का न है कोई जवाब,
रंगीनिये-अदा से बदनाम है कोठा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ जुलाई, २०२० ईसवी)