आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का ‘उनकी कविता-कामिनी’ को एक मधुरिम सम्बोधन

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

मेरे हृदयप्रान्त की सम्राज्ञी कामिनी कविते!

तुम्हारे सर्वांग पर जब मैने पहली बार दृष्टि-अनुलेपन किया था तब मुझे ऐसा प्रतीत हुआ था, मानो प्रकृति-सुरभि तुम्हारे अंग-प्रत्यंग और स्निग्ध प्राणों पर ओस भीगे हुए पुष्प की वर्षा कर रही हो। तुम्हारी अरुणिम अँगुलियाँ मानो नील यमुना की ऊर्मियाँ हों और आँखों पर घृत के प्रज्वलित दीप संचरण कर रहे हों और झिलमिलाती हुई क्षीण प्रतिच्छाया ऐसी प्रतीत होती थी, मानो मेघ के मध्य से निकलकर शशांक तुम्हारा क्षणिक दर्शन करने के लिए उत्सुक और व्यग्र हो रहा हो। तुम्हारे मुख से वर्षाबूँदसदृश खुले-धुले शब्द झर रहे थे, जिनसे नये-नये अर्थ और आकार खुलते थे। बूँदों की भाषा मे मानो तुम संवाद कर रही थी। तुम्हारी उक्तियाँ बिजुरी-सी कौंध जाती थीं। तुम्हारे शब्द और अर्थ, मानो जीवन के अवधारणा और उसके सोद्देश्य औचित्य को तोल रहे थे।

तुममे एक आन्तरिक नैसर्गिक सौन्दर्य है, जो तुम्हारे मुख-मण्डल को उद्दीप्त करता है और तुम्हारे कर्तृत्व (‘कृतित्व’ अशुद्ध शब्द है।) को दिव्य आभा से द्युतिमान् (कान्तिमान्) भी। तुम्हारा व्यक्तित्व अतिशय आत्मनिष्ठ और आत्मकेन्द्रित है, इसीलिए तुममे सरसता है; सहजता है; समरसता है; सारगर्भिता है; प्रखरता है; प्रांजलता है, भाव-प्रवणता है तथा भास्वरता भी।

तुम्हारी यशस्विता सार्वत्रिक संलक्षित हो रही है। हे विविध (‘विभिन्न’ अशुद्ध है।) स्वरूपा! तुम्हारे जीवन्त शिशु, बाला, किशोरी, तरुणी, युवती, प्रौढ़ा, वृद्धा तथा वयोवृद्धा अवस्था का प्रभाव मैने आत्मसात् कर लिया है। तुम्हारी देहयष्टि और दैहिकी पर वस्तुपरक दृष्टि निक्षेपित करता हूँ तब ‘तुम्हारे’ सौन्दर्य पर किंचित् प्रभाव नहीं दिखता; क्योंकि तुम ‘अक्षत यौवना’ हो; समय-सत्य और समय-सापेक्ष की प्रतीति भी।

अन्यतमा काव्ये! स्वयं से तुम्हारे विलग होने की मात्र कल्पना एक दु:सह स्वप्न-सा प्रतीत होने लगती है। मै जब तक अस्तित्व मे हूँ, तुम मेरे अधरों पर मृदु हास लिये स्व- हस्ताक्षर करते हुए, मेरे चिर-संचित अभिलाष (‘अभिलाषा’ अशुद्ध शब्द है।) को धन्य करती रहो।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १० जुलाई, २०२२ ईसवी।)