— डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
मुखड़ा मौलिक दिख रहा, दिखता करुणा-रूप।
शोकाकुल परिवेश है, बनती मृत्यु अनूप।।
दो–
मौन निमन्त्रण मौन है, सूनी माँग न देख।
सधवा विधवा बन गयी, कैसा विधि का लेख।।
तीन :
बचपन सिसकी ले रहा, क्रन्दन करता गेह।
चित्र-लिखित सब पात्र दिखें, रक्त रच रहा देह।।
चार :
प्रश्न ठिठकता रह गया, उत्तर भी था मौन।
शून्य दृष्टि सर्वत्र थी, कौन करे तब ‘कौन’?
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ फ़रवरी, २०२० ईसवी)