★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
लेखनी उठायी है तो यों ही नहीं,
आस जगायी है तो यों ही नहीं।
दुश्मनी हद से गुज़र जाने दो अब,
दोस्ती निभायी है तो यों ही नहीं।
राज़फाश करना ज़रूरी है अब,
चादर उठायी है तो यों ही नहीं।
महब्बत सरे आम हो जाने दो,
आँखें मिलायी हैं तो यों ही नहीं।
वादाख़िलाफ़ी मेरे खूं में नहीं,
राहें हटायी हैं तो यों ही नहीं।
उम्मीद नाउम्मीद हो, फ़र्क़ नहीं,
बुझी जलायी है तो यों ही नहीं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १३ दिसम्बर, २०२० ईसवी।)