निगाहें नज़र से कह रहीं, डर है बहुत यहाँ

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
मन्दिर-मस्जिद के शंख-अज़ान बजते रहे,
इज़्ज़त नीलाम होती रही, इक शख़्स न उठा।
दो–
इस धर्म के इतिहास में, धर्मराज भी यहाँ,
द्रौपदी की चीख़ भी, सुनकर न सुन सके।
तीन–
कैसी विडम्बना है, इस धर्म-देश की!
काली कमाई देश की, देवी-देव खा रहे?
चार–
धर्म-कर्म की है आड़ में, बलन्दी अब पाप की,
निगाहें ‘नज़र’ से कह रहीं, डर है बहुत यहाँ।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज ; ३० दिसम्बर, २०२० ईसवी।)