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आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

■ म्लेच्छ-भाषा– अर्थ, अभिप्राय तथा अवधारणा

अस्पष्ट भाषा/अपभ्रंश भाषा ‘म्लेच्छ-भाषा’ है। जिन वर्णों के उच्चारण व्यक्त न हों, वे ‘म्लेच्छ-भाषा’ कहलाती हैं। किरात, खस, बर्बर, पह्लव, पौण्ड्र, द्रविड, शक, शबर, सिंहल, यवन इत्यादिक जातियाँ-जनजातियाँ-बर्बर जातियाँ ‘म्लेच्छ’ कहलाती हैं और उन सभी की भाषा ‘म्लेच्छ-भाषा’ कहलाती है। ऐसा इसलिए कि वे जातियाँ ‘वर्ण-व्यवस्था’ से इतर जातियाँ हैं और उनकी भाषा ‘म्लेच्छ-भाषा’ के रूप में रेखांकित होती है। सभ्यता के राहित्य-काल में वे लोग अनाचारी, कदाचारी दुराचारी, दुर्दान्त तथा अधम होते थे।

‘शतपथब्राह्मण’ में एक स्थल पर कहा गया है, “ते असुरा आत्त वचसो हे अलवो! हे अलवो! इति।”
अर्थात्– असुरजन ‘हे आर्य! हे आर्य!’ के स्थान पर ‘हे अलव! हे अलव!’ कहते थे।

म्लेच्छ के समानार्थी शब्द हैं—- ‘मलिच्छ’, ‘मलिक्ष’ तथा ‘मलेक्ष’। यह पुंल्लिंग-शब्द है, जो एक प्रकार के व्यक्ति का सूचक है।

‘प्रद्योत-वंश’ को पढ़ें।
‘भविष्यपुराण’ और ‘वायुपुराण’ का अनुशीलन करें।

भविष्यपुराण १.४ के अनुसार, प्रद्योत म्लेच्छों :– यवन, खस, शक, कामस, हारहूण, बर्बर इत्यादिक म्लेच्छ कहलाये हैं।
‘शुक्रनीतिसार’ का अध्ययन करें, जिसमें दैत्यगुरु शुक्राचार्य कहते हैं :–
“त्यक्तस्वधर्माचरणा निर्घृणा: परपीडका:।
चण्डाश्चहिंसका नित्यं म्लेछास्ते ह्यविवेकिन:।”
(भावानुवाद– जिन्होंने अपने धर्म का आचरण करना का त्याग किया है, जो निष्ठुर हैं; दूसरों को कष्ट पहुँचाते हैं; क्रोध करते हैं; नित्य हिंसात्मक आचरण करते हैं; विवेकहीन हैं, वे ‘म्लेच्छ’ कहलाते हैं।

‘महाभारत’ के ‘आदिपर्व’ के अध्याय १४४ के श्लोक २०-३४ को समझें।

बृहद् जानकारी के लिए ‘मत्स्यपुराण’, ‘विष्णुपुराण’ तथा ‘बृहत्संहिता’ का अनुशीलन किया जा सकता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० दिसम्बर, २०२० ईसवी।)