ब्लॉक कोथावां में वोटर लिस्टों की बिक्री के नाम पर हो रही अवैध वसूली

अव्यक्त सत्ता जोड़ लो समष्टि से

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

हो रहा है जो, जहाँ सो हो रहा।
व्यर्थ ढपली, बज रही कर्त्तव्य की,
भार भारी लग रहा, सब दिख रहे।
गात शिथिल स्पष्ट सब लक्षित हुए,
कौन जाने कौन-सा पल क्या रहे!
बयार हलकी बह रही है ज्ञान की,
सो रहा है जो, जहाँ सो सो रहा।।
स्याह परछाईं क़दम ले बढ़ रही,
लक्ष्य की धूमिलता चिन्ता नहीं।
आग से खेली हैं अपनी अँगुलियाँ,
जल भी जाऊँ तो कोई चिन्ता नहीं।
रस की गागर ले बढ़ी अल्हड़ कोई,
खो रहा है जो, जहाँ सो खो रहा।
मन तरंगित हो रहा अभिसार में,
पहरेदारी याम आठों कर रहे।
इन्द्रियाँ बन रहीं बगुला भगत,
संघर्षण तन सुगन्धित कर रहे।
रूपसी है वासना में जल रही,
रो रहा है जो, जहाँ सो रो रहा।
अव्यक्त सत्ता जोड़ लो समष्टि से,
आत्म मुग्ध मति से अब विरक्त हो।
कामना-से-कामना को गूँथ कर,
आत्मा-से-आत्मा अनुरक्त हो।
गठरी मोह-माया, छल-प्रपंच की,
ढो रहा है जो, जहाँ सो ढो रहा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० अप्रैल, २०२१ ईसवी।)

url and counting visits