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आज़ाद क़लम

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
चपटी धरती है कहीं, कहीं दिखे है गोल।
आँख उठाकर देखिए, सब हैं पोलमपोल।
दो–
तुलसी औ’ कबीर सूर, सदा हमारे संग।
क़लम आज हैं बिक रहे, दिखते नंग-धड़ंग।
तीन–
शिथिल पड़ी संवेदना, कपट हुई मन-बात।
पहचानो! जयचन्द को, कस के मारो लात।।
चार–
हया बेहया बन गयी, मन भी भरता घात।
शील-हया खण्डित दिखें, हरदम खाते मात।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० अप्रैल, २०२१ ईसवी।)

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