—- आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक–
चाँदनी ने चोरी की और रौशनी ने लूटा,
बेचारे चाँद और सूरज की गिरिफ़्तारी क्यों?
दो–
बेरहम-बेमुरव्वत की दुनिया बहुत निराली है,
अपनी ख़ुद्दारी की गठरी को सलामत रख।
तीन–
बेकसी-बेबसी-बेक़द्री की ज़िन्दगी क्यों?
आओ! हौसले की एक बस्ती बना लें हम।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २४ सितम्बर, २०२० ईसवी।)