दीप्तित अचला का हाल है

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद

क़दम  ताल  सीमा  पे  करते,

भारत   माता   के   लाल  हैं!
राष्ट्र   मुकुट  न  झुकने  पाये,
रखे   चरण   निज  भाल  हैं!
विपदा राष्ट्र  के पथ जो आयी,
दुश्मन को  किये  बे-हाल  हैं!
अरि  को   मार-काट   करके,
नरमुण्डों से सजाये  थाल  हैं!
रक्त   रगों    में   उबल   रहा,
वीरोचित   गर्वीली   चाल  है!
ऐसे  मणियों  की   आभा  से,
दीप्तित  अचला का  हाल  है!
ऐसे  वीर  सपूतों  को  पाकर,
हर  जननी   हुई  निहाल   है!