एतिबार करना मत, झूठी हैं कुर्सियाँ

 

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


कुर्सी है माई-बाप, अवसर हैं कुर्सियाँ,
कुर्सी है छल-छद्म, हिंसक हैं कुर्सियाँ।
जिस राह पे चलो, ख़ूब देख-भाल कर,
क़ानून को भी आईना, दिखातीं कुर्सियाँ।
ग़रीब का चूल्हा है, उधारी में जल रहा,
अमीर का चूल्हा, जला रहीं कुर्सियाँ।
दग़ा मत करना, सच का साथ देना तुम,
एतिबार करना मत, झूठी हैं कुर्सियाँ।
‘पृथ्वी’ को अब तक, फ़रेबी ही सब मिले,
बना सकते तो बनाओ, वफ़ादार कुर्सियाँ।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ३० जून, २०१८ ईसवी)