‘संस्कृत’ और ‘हिन्दी’ के साथ किया जा रहा क्रूर छल!

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

शिक्षिका मनोरमा जी!
आपने यह वीडियो प्रस्तुत करके अपने खोखले ‘संस्कृत-ज्ञान’ का बहुविध परिचय प्रस्तुत कर दिया है। शुद्ध शब्द ‘संस्कृत’ है; उच्चारण ‘सम्सकृत’ है, न कि ‘सन्स्कृत’। आप सभी का उच्चारण अशुद्ध है। केवल दिखावे के लिए उपक्रम न करें; ‘सम्सकृत’ को धारण करें।

जो लिपिबद्ध शब्द दिख रहे हैं, अशुद्ध हैं; जैसे– मातरम, पश्चात, वार्तालाप, बिल्कुल, ना अस्ति, पूर्ण विरामचिह्न के स्थान पर अँगरेज़ी के पूर्ण विरामचिह्न (.) का व्यवहार आदिक। आपको हिन्दीभाषा की न तो मौखिक समझ है और न ही लिखित भाषा का बोध है।

आप “दिमाग मे ‘बड़े-बड़े वेद, रामायण और महाभारत उपजने लगते हैं” का उच्चारण कर रही हैं। क्या आप बता सकती हैं– आपके वेद, रामायण और महाभारत यदि बड़े-बड़े हैं तो कितने ऊँचे और कितने चौड़े हैं?

कथित शिक्षिका जी! आप भाषा-प्रयोग के साथ छल न करें। आप उच्चारण कर रही हैं– अस्ती, अस्मी। यह ‘अस्ती’ और ‘अस्मी’ क्या है? आप ‘अस्ति’ और ‘अस्मि’ का उच्चारण नहीं कर सकतीं? आप संस्कृत-शिक्षिका होकर न तो ‘संस्कृत’ शब्द का शुद्ध उच्चारण कर पा रही हैं और न ही हिन्दी-भाषा का। आप तो ‘भाशा’ बोल रही हैं। आपको ‘श’ और ‘ष’ मे अन्तर ज्ञात नहीं? “मै संस्कृत की कक्षा ले रही थी।” आपका यह वाक्यविन्यास शुद्ध है? आपको लज्जा आनी चाहिए कि एक संस्कृत-आचार्या होकर आप ‘इच्छामि’ का उच्चारण, ‘इक्षामि’ कर रही हैं। आप कहाँ की संस्कृत-आचार्या हैं?

“तो वो वार्तालाप संस्कृत मे होने लगी।” शिक्षिका मनोरमा जी! आपका यह वाक्य-विन्यास अशुद्ध है। आप एक संस्कृत-शिक्षिका होकर अनुस्वार और अनुनासिक के शुद्ध प्रयोग से अनभिज्ञ हैं? आश्चर्य है!

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यह वीडियो पूर्णत: अशुद्ध वाचन और लेखन का बोध करा रहा है, जो कि निन्द्य है। इस नितान्त निकृष्ट प्रायोजित आत्मप्रचार से हमारे विद्यार्थियों का अहित न करें। इसे अविलम्ब हटा लें।