सत्याधर (कुरसठ, हरदोई)-
कब तक दिल का रोना रोयें,
अब मत करिये उसको य़ाद ।
जितनी गुजरी रो-रो गुजरी,
शेष जो है ना कर बरबाद ।
खाकी, खादी, मुंसिफ, मुजरिम
सब मिल बैठे हैं फिर तो
कौन सुनेगा अपनी बोलो
अब किससे करिए फरियाद?
रस पराग लुट गया चमन का,
भवरों की अगवानी में
कलियाँ कैसे खिल पायेंगी?
गुलशन गुलशन है सैय्याद।
ऐ गजलों! जब तक मैं हूँ,
तुम तब- तक फलीभूत रहियो।
कौन पढ़ेगा तुमको ‘सत्या’
कौन सुनेगा मेरे बाद?