डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी-
ऐ! रुको! रुको! मेरे अतीत,
मत वर्तमान से खेल करो !
गाया तुमको मैने अतीत!
जैसे कि कोई शोक गीत।
तुम वर्तमान से दूर रहो,
मत करो मेरे उर को सभीत।
तुम मिट्टी थे, ये सोना है,
मत कोई उल्टा मेल करो!
ऐ! रुको!
तोड़ा था मुझको जार जार,
तुम छोड़ गये थे अंधकार।
मैं हर्षसिक्त हूँ, सच मानो,
फिर से मत छेड़ो नयी रार।
मैं पुष्पिततरु, मेरे तन पर
मत काँटो वाली बेल करो!
ऐ रुको!
