सेंसेक्स की उठापटक में, रिश्तों का अस्तित्व है नाटा

जगन्नाथ शुक्ल ‘जगन’, प्रयागराज :

ऊँची-ऊँची मीनारों में, पसरा है भीषण सन्नाटा।
सेंसेक्स की उठापटक में, रिश्तों का अस्तित्व है नाटा।।

गाँव अभी तक करता आशा,
बदली संकल्पों की भाषा।
शंकाओं के मेघ घनेरे,
घटा रहे जीवन-प्रत्याशा।

होरी अब तक होरी ही है, दिखता कम्पनियों का घाटा।
सेंसेक्स की उठापटक में, रिश्तों का अस्तित्व है नाटा।

गाँवों की पगडण्डी सूनी ,
कलरवहीन हुए घर-आँगन;
खेतों ने हरियाली त्यागी,
वैभवहीन हुआ अब सावन।

हुआ दशहरा गई दिवाली, मुनिया फ़ोन से करती टाटा।
सेंसेक्स की उठापटक में, रिश्तों का अस्तित्व है नाटा।

बाबू जी ने पाई-पाई;
जोड़-जोड़ जागीर बनाई।
कुछ वर्गफुट फ्लैट के ख़ातिर;
बिकने की अब नौबत आई।

नई नस्ल अब भूक रही है, खा कर पैकेट वाला आटा।
सेंसेक्स की उठापटक में, रिश्तों का अस्तित्व है नाटा।