राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’-
माँ के लिए नहीं कभी
दो सौ रूपये की साड़ी,
लेकिन वैलेंटाइनडे पर
पाँच सौ रूपये का गुलाब ।
भौतिक तृष्णाओं का
ये सजीला गुलदस्ता है,
आजकल के प्रेम का
है अपना ही अन्दाज़ ।
सप्ताह भर में दोस्ती से
प्यार तक का सफर,
शारीरिक क्षुधा के शमन को
कम तो नहीं लगता है ।
पाक़ रूहानियत चाहिए
प्रेम करने के ख़ातिर,
यहाँ तो ज़िन्दा रहने को
क़त्ल रोज़ होते हैं ।