कविता : आजकल का प्यार

राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’-


माँ के लिए नहीं कभी

दो सौ रूपये की साड़ी,

लेकिन वैलेंटाइनडे पर

पाँच सौ रूपये का गुलाब ।

भौतिक तृष्णाओं का

ये सजीला गुलदस्ता है,

आजकल के प्रेम का

है अपना ही अन्दाज़ ।

सप्ताह भर में दोस्ती से

प्यार तक का सफर,

शारीरिक क्षुधा के शमन को

कम तो नहीं लगता है ।

पाक़ रूहानियत चाहिए

प्रेम करने के ख़ातिर,

यहाँ तो ज़िन्दा रहने को

क़त्ल रोज़ होते हैं ।