बहना छोड़ो न अपना भाई

सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’

बहना छोड़ो न अपना भाई।
माना हम कमजोर बहुत, स्तर जीवन छोटा।।
आने जाने में होती फजीहत, बिन पेंदी का लोटा।।
एक ही मां के गर्भ रहे हैं, एक ही पितु और माई।
बहना छोड़ो न अपना भाई।।

बढ़ा हुआ है स्तर तेरा, काम बड़े अलबेले।
फुरसत क्या अब नहीं मिलेगी, रहना होगा अकेले।।
त्यौहारों पर रास्ता देखा, पर बहना ना आई।
बहना छोड़ो न अपना भाई।।

काम-धाम के चक्कर में फंस, हो रही अपनी दूरी।
ईश्वर ने कितना पास रखा था, फिर भी हुई मजबूरी।।
उत्सव-पर्व में दिखे नहीं, सन्नाटा हो जाई।
बहना छोड़ो न अपना भाई।।

आती हो जब मेरे घर को, उपहार नहीं कोई दे पाता।
जो भी देता पुरजोर लगाकर, वह सबके मन ना भाता।।
घर परिवार कदर ना करते, दो टके का क्या ले आई।
बहना छोड़ो न अपना भाई।।

जानू मानू तेरी मजबूरी, फिर भी धीरज खोता हूं।
पाकर सबको भूल न सकता, तेरे लिए मैं रोता हूं।।
परदेशी कहे खुश रहे मेरी बहना, प्रभु से यही मनाई।।
बहना छोड़ो न अपना भाई।

सुधीर अवस्थी परदेसी
पत्रकार /लेखक/कवि/हस्तरेखा विशेषज्ञ
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष/प्रवक्ता सनातनधर्म प्रचार महासभा
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