नेताओं की बात सुनो मत, सबकी गिरगिट से यारी

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

कहीं उमंग-उत्साह नहीं है, सब दिखते हैं खोली मे,
परिपाटी से अधिक नहीं कुछ, देख असर इस होली मे।
महँगाई का असर है इतना, मीठा ‘मीठ’ नहीं लगता,
महिमा है बाज़ार की प्यारे! भूख मर रही होली मे।
चौकीदार बना महाराजा, लूट हो रही घर-घर की,
लज्जाभाव नहीं चेहरे पर, आग लगाये होली मे।
बेटा-बेटी बिलख रही हैं, दो टुकड़ों की आस लिये,
मा मूर्च्छा मे पड़ी है देखो, बाप खो गया होली मे।
गैस-सिलिण्डर मुँह बिचकाये, एक किनारे खड़ा पड़ा,
महँगी लकड़ी कहाँ से लायें, किसे जलायें होली मे?
चोट्टों का है नया ज़माना, हरिश्चन्द-औलाद दिखें,
मेरी ग़र मानो तो भइया! उन्हें जला दो होली मे।
निर्मम बनकर देश लूटते, लाज-शर्म सब घोल पिये,
रस मे ऐसे भाँग को घोलो, पुन: दिखें न होली मे।
काले हैं अँगरेज़ यहाँ के, नीयत हैं सबकी खोटी,
जाति-धर्म, मज़्हब के झगड़े, सभी जला दो होली मे।
वरना इक तूफ़ान उठेगा, ज़ल्ज़ला भी आयेगा,
ताक़त सबकी हिरन दिखेगी, असर दिखेगी होली मे।
नेताओं की बात सुनो मत, सबकी गिरगिट से यारी,
“थाली के बैंगन” हैं समझो, नहीं बुलाओ होली मे।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ८ मार्च, २०२३ ईसवी।)