1. वसुधा पर मानव
कुछ सीखा है हमने जग में, वसुधा के इस आँचल से
पौरुष की गाथा को सुनता आजीवन मानव व्याकुल मन से।
सुरसरि के अविरल प्रवाह को बाँध दिया तब शंभू ने
स्थान जटा में तब देकर क्षय किया अमंगल शंभू ने।
उच्च अभिलाषाएं भी तो होंती मनुज मात्र का बल है
किंतु विजय की समरभूमि में भी चलता तो छल है।
प्रमेय बनी रहती है मानवजीवन के हर पथ की धारा
सर्वस्व सिद्ध न हो पाता, यह मानव है अप्रमेय बेचारा।
पर्णकुटी से महल और शस्त्र-शास्त्र का उपभोग किया
विषयासुख की कामनाओं में मानव ने ही भोग किया।
दोषहीन है नही कोई नर, कलयुग का जग व्यापित है
धारणा सत्य धर्म की नही, इसलिए मनुज अभिशापित है।
उगता दिनेश पृथ्वी पर यदि बिना किसी अवसर के
होता कलेश, उत्पात जगत और देवों के परिसर में।
आगम-निगम के सेतुबन्ध पर नियम नीति ही खम्भ है
संसार सकल के आवरण में निरुपम व्यक्ति ही स्तम्भ है।
2. स्त्री-विमर्श
कल्पना की परिधि में नारी भी है ऐसी विधि,
क्रोध ममता दया क्षमा से परिपूर्ण है ऐसी निधि।
रहती विकल वह सर्वदा हेतु हित निज कुटुंब के
आवरण में लिपटी मगर दीप्ति जलती तुंग से।
निशीथ के उस उष्म का मृदुल है मधुकाल वही
भोर मङ्गल के आंगन का कलरव उषाकाल वही।
जगत विपिन की धरा में बनती सुमनवाटिका वही
मानव विजय बेल की थाल पर धरती दिया टीका वही।
स्त्री अभीत मृग की तरह सौरभ से समीर है
सविता मरीचिका के जैसे सरित सागर का नीर है।
पावन अपावन की डोर अपार दुख की बदरी सही
शांत सौम्य मुखमण्डलित फिर भी वह व्यथित रही।
भविष्य आज और अतीत में वनिता का वो पाहन कहां,
अबला को सर्व वर्णित करे अभिजीत का वो साहस कहां।

अभिजीत मिश्रा,
बालामऊ, हरदोई