सजनी! तुमको दया ना आयी

सजनी! तुमको दया ना आयी ।
इतनी निष्ठुरता से देखा ।
अविरल बही अश्रु सरि रेखा।
अपनी त्रुटि खुद समझ न आयी ।
दृशा – दशा पूरित हो आयीं ।।
तब भी तुमको दया न आयी ।।

पुनर्मिलन की आश लगाये ।
व्यस्त रखा, खुद को भरमाये ।
जो भी सुना, अतर्क अपनाया ।
वलित व्यंजना साध न लायी ।
मन – मन्थन प्रतिपाह न पायी ।।
तब भी तुम को दया न आयी ।।

दरपन मन मालिन्य हो चला ।
अरपन – शत सानिन्द्य हो चला ।
संबंधों के भौतिक बंधन ।
पाऊँ कहाँ सबल अवलंबन ।
मौनी माधविका कुम्हलायी ।।
तब भी तुमको दया न आयी ।।

प्रेम प्रार्थना प्रभामती सी ।
रीत रंजना वन सलिला सी ।
गहराई में जा – जा कर भी ।
अन्तस्तल की थाह न पायी ।
प्रीयुलता सहमति सहजायी ।।
तब भी तुमको दया न आयी ।।

नवगति नवलय, अभिनव -अभिनय ।
चित चिन्तन में, प्रतिलिपि संचय ।
विविध पंथ पंथी बन खोजा ।
तब भी एक झलक न पायी ।
रजनी और कठिन व्रत लायी ।।
तब भी तुमको दया ना आयी ।।

लोकालय में परिणीता सी ।
अंधालय में पुंज प्रकाशी ।
ध्यानमग्नता इतनी गहरी ।
रंचमात्र सुधि बिसर न पायी ।
बीती पाइ-पाइ बिनु पायी ।
सजनी! तुमको दया ना आयी ।।

   अवधेश कुमार शुक्ला 'मूरख हिरदै' 
       शिव की महारात्रि, फाल्गुनी
          त्रयोदशी, कृष्णपक्ष