● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
इस जगत् मे ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, जो आप कुछ सोचें और वह उस सोच को, आपसे बिना कोई प्रश्न किये, सीधे बता सके। आप जब कुछ सोचते हैं तब उस सोच से सम्बन्धित व्यक्ति-विशेष-द्वारा प्रश्न और प्रतिप्रश्न करने पर जैसे ही आप उत्तर देने शुरू करते हैं, आपके सोच का प्रारूप उस व्यक्ति के मस्तिष्क मे उतरने लगता है और वह कुछ ही देर मे बता देता है कि आपका सोच क्या है।
इन दिनो इसी तरह का धन्धा फूल-फल रहा है। लगातार ठोस अभ्यास करके आप भी पढ़े-लिखों को ‘चतुर मूर्ख’ बना सकते हैं। बोलने की कला मे भी महारत हासिल कर लें, फिर तो ”सोने मे सुहागा”। इस तरह से ‘धन्धालय’ ज़ोर मारते हुए दिखता रहेगा।
बेरोज़गार-युग मे यह धन्धा-पानी बुरा नहीं है। भीड़ लगेगी तो राजनेता और सफ़ेदपोश आपके ‘धन्धालय’ मे घुटनो के बल रेंगते हुए नज़र आयेंगे। जितने प्रकार के पाप हो सकते हैं, “डंके की चोट” पर करते रहिए, तरह-तरह के प्रधानमन्त्री, मुख्यमन्त्री, मन्त्री, बड़भैये-छुटभैये नेताइन-नेता आपके ज्ञानसागर मे हिलोरे मारते दिखेंगे।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ फ़रवरी, २०२३ ईसवी।)