
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
कतिपय काव्यपंक्तियाँ
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक : वो दिल का क़ातिम (काला) है और कातिल भी,
क़ातिब (लेखक) ने उसे क़ादिर (शक्तिशाली) बना दिया।
दो : अपनी क़ुबूलियत पे तुम इतराओ मत,
तीन : उन्हें यक़ीं है सत्ता में फिर से क़ाबिज़ होने का,
कबूतरबाज़ के अब दोनों हाथ ख़ाली हैं दिखते।
चार : अपने पर्वाज़ को परवान चढ़ाओ मत,
पर कतरने के हर हुनर में हम माहिर हैं।
पाँच : मैं किसी का ख़ादिम (पराधीन) नहीं,
मुझ पे हुक़्म मत चलाना तुम।
छ: : मेरी नज़रें ख़ुद से हैं बातें करतीं,
तुमसे शिकवा है पर वे गुस्ताख़ नहीं।
सात : तमन्ना नहीं कोई भी संग रहे,
तनहाई अब शिद्दत से जीता हूँ।
आठ : साथ चलना अब बहुत ही मुश्किल है,
न तुम झुको, न मैं यों ही चलता रहे।
नौ : मौत-सी ख़ामोशी जिधर देखो उधर है पसरी,
गुले गुलज़ार को चिलमन से ढँके रहने दो।
दस : प्रश्नों के तीर क्यों चलाते हो?
बहुत शातिर हो, उत्तर भी साथ रखते हो?
ग्यारह : तुम्हारी पाक़ीज़गी सलामत रहे,
बेईमान नज़रें गुफ़्तुगू करने लगीं।
बारह : गाते-गाते ठहर क्यों गये?
संगीत तो नदिया की धारा है।
तैरते-तैरते थम क्यों गये,
अभी तो दूर बहुत किनारा है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १४ मार्च, २०१८ ई०)