निराश क्यों ?

आकांक्षा मिश्रा, बस्ती उत्तर -प्रदेश-


 हे मनुष्य !

तुम कभी विफल नहीं हुए

फिर अकारण निराश क्यों ?

कल्पना के अधीन होकर

स्थिरता का कैसा विस्तार

कर रहा है मनुष्य ।

प्रकृति का स्पर्श ही

मन को पुलकित कर

नवीनता का आह्वान

मनुष्य अधीर होकर पीड़ाओं को

जन्मजात गोद में ले रहा

यह असफलता का द्वार है ।

हे मनुष्य !

देखो प्रकृति का सुंदर दृश्य

सुबह जो अब धीरे-धीरे

दोपहरी में ढलती हुई

साँझ में ढलकर

सुबह का आह्वान करती हैं

संसार को खूबसूरत बनाकर

भिन्न-भिन्न रंगो से सजाकर

पुनः मनुष्य के आँखों में

सुनहरे सपनों के लिए

आशा का पुनः संचार कर रही हैं ।